मौजूदा मसाला फिल्मों के दौर में फिल्मकारों की मजबूरी बन गई है कि उन्हें एक अच्छे मैसेज को ग्लैमर की चाश्नी में डूबो कर पेश करना पड़ता है, महेश भट्ट की जन्नत भी इसी का नमूना है।ये क्रिकेट की ही नहीं प्यार और पैसे की कहानी है। आज के हर युवा की चाहत है पैसा, गाड़ी, खूबसूरत घर और मनचाहा महबूब, लेकिन इन सब को हासिल करने के लिए वो कैसे हथकंडे अपना रहे हैं, महेश भट्ट ने युवा पीढ़ी के इस अंदाज से जुड़ी भावनाओं को बखूबी पड़ा है। फिल्म की शुरुआत में अखबारों की सुर्खियों बनी वो खबर याद आती है, जिसमें एक युवक ने अपने गर्लफ्रैंड को खुश करने के लिए लग्जरी कार चोरी करने के जुर्म में जेल की हवा खाई थी। फिल्म ऐसे ही एक युवक अर्जुन (इमरान हाशमी) की कहानी है, जो अपने पिता के असूलों की बजाए क्विक मनी में यकीन रखता है, जुए में हार के बाद जब अर्जुन क्रिकेट मैच बुकी के रुप में सफल होता है, तो फिर पैसे और सफलता का जुनून ऐसा चढ़ता है, कि अपनी मोहब्बत जोया (सोनल चौहान) को भी नजरअंदाज करने लगता है। फिल्म की शुरुआत में नवोदित डायरेक्टर कुनाल देशमुख ने गर्लफ्रैंड की खुशी के लिए गैरकानूनी कामों में उतरने की घटनाओं को कहानी में बखूबी पिरोया है। सोनम के पास पहले हाफ में करने के लिए कुछ नहीं है। लेकिन सेकेंड हाफ के कुछ सीन्स में वह प्रभाव छोड़ती नजर आई। समीर कोचर भी अपने किरदार को दमदार निभा गए हैं, लेकिन फिल्म की यूएसपी सिर्फ इमरान हाशमी हैं। महेश भट्ट कैंप की पैदावार इमरान ने एक बार फिर उन पर गर्व करने का मौका दिया है। फिल्म के हर फ्रेम में उनके अलग अलग शेड्स देखने को मिलते हैं और प्रभावित करते हैं। इमरान अपने सपनों का पीछा करते हुए जुएबाज से सट्टेबाज और फिर मैच फिक्सर बन जाता हैं। केपटाउन पहुंचकर वह आतंकवादी गुट के सरगना जावेद शेख भाई के चंगुल में फंस जाता है। फिल्म का क्लाइमेक्स आप पर पहाड़ की तरह टूट सकता है, जो कहानी का सबसे जबरदस्त पहलू है। कहानी का अंत हो सकता है कुछ लोगों को पसंद न आए, लेकिन ये एक सकारात्मक संदेश देता है। विलेन के कैरेक्टर में जावेद शेख भी जंचे हैं। राजू सिंह का बैकग्राउंड स्कोर खास कर दूसरे हाफ में चेस सीन में काफी रोमांचक है। प्रीतम और कामरान अहमद का म्यूजिक भी ठीक है। भट्ट ने एक बार फिर पाकिस्तानी गाने का प्रयोग किया है। खैर इस मसाला मूवी में लपेट के दिए संदेश की खातिर इस एंटरटेनिंग मूवी को आप एक बार देख ही सकते हैं।
गुरुवार, 22 मई, 2008
शुक्रवार, 16 मई, 2008
मजेदार है भूतनाथ से फ्रेंडशिप
तारे जमीन के बाद बाक्स आफिस पर एकबार फिर परिवार खास कर बच्चों के देखने लायक फिल्म आई है। भूतनाथ आधुनिकता के दौर में पेरेंट्स और बच्चों में खत्म होती संवेदनाओं के साथ ही नि:स्वार्थ प्यार की कहानी बयान करती है। आपको अब नन्हें हीरोज का दबदबा मानने की आदत डालनी होगी। बीग बी को शाहरूख टक्कर दे सकते हैं या नहीं बाद की बात है लेकिन नन्हां अमन ये दम रखता है। ऐ चार फुट दो इंच के बदले ऐ छह फुट 2 इंच का डायलॉग अमिताभ की डॉयलॉग डिलवरी की हाइट पर जाकर बोलने के साथ ही अमन ने ये साबित कर दिया है। पूरी फिल्म दोनों के कंधों पर है और दोनों ने ही इस जिम्मेदारी को बखूबी निभाया है। दोनों एक दूसरे को पूरी तरह कम्पलीमेंट करते नजर आते हैं। एंट्री में भद्दे भूत के रूप में भी अमिताभ काफी डिसेंट लगे हैं। कहानी एक परिवार की है, जिसमें पापा शाहरुख ट्रांसफर के बाद गोआ पहुंचते हैं, जो जॉब के सिलसिले में खुद तो चले जाते हैं और नया घर संभालना होता है मम्मी जूही चावला और नन्हें बंकू यानि अमन सिद्दीकी को। उनकी मुश्किलें और बढ़ जाती हैं जब पता चलता है कि खूबसूरत घर पर डरावने भूत का कब्जा है। लेकिन नन्हां बंकू मम्मी के कहे मुताबिक भूत नहीं सिर्फ ऐंजल को जानता है। बस फिर वो डरने की बजाए उसको चैंलेज करता है और दोस्त बना लेते हैं। बच्चे आराम से फिल्म देख सकते हैं, क्यों कि भूतनाथ भाई भी इमोशनल हैं और बच्चों के प्यार से मोहित हो जाते हैं। अरे जनाब बिग बी सूटेड बूटेड भूत जो ठहरे। उनके भूत बनने की पीछे कहानी भी आज के समाज की तस्वीर को पेश करती है, जिसमें बच्चे बेहतर करियर के लिए पेरेंट्स की परवाह किए बगैर विदेश चले जाते हैं और उन्हें भूल जाते हैं। शाहरुख खान की 20 मिनट की मेहमान भूमिका के साथ ही प्रियाशंू भी दूयरे हाफ में ठीक लगे हैं। जूही चावला भी केयरिंग मां के किरदार को निभा गई हैं और बच्चे सतीश शाह को पंसद करेंगे। राजपाल यादव को वेस्ट किया गया है। नए डायरेक्टर विवेक शर्मा कहानी को संभालने में सफल हुए हैं। खास बात ये कि आजकल के जो बच्चे सफलता के लिए शॉट कट या मैजिक का सहारा चाहते हैं, भूतनाथ उन्हें अपनी जंग हिम्मत से लडऩे की सलाह देते हैं। तो बच्चो भूतनाथ से दोस्ती करनी है, तो आप मम्मी-पापा को मना ही लो। वैसे फिल्म को ओपनिंग एवरेज रही। अगर फिल्म कहीं जून की छुट्टियों में रिलीज होती तो बाक्स आफिस की तस्वीर अलग होती। म्यूजिक जरूर निराश करता है, लेकिन आखिर का गाना सुनने लायक है।
शुक्रवार, 2 मई, 2008
वादियों में गूंजते किसी गाँव के मातम में 'शौर्य' क्या है?
’शौर्य’ भारत की चुनिंदा सच्ची फ़िल्मों में से एक है। उस दौर में, जब असाधारण गति से आगे बढ़ने के साथ अभिव्यक्ति की आज़ादी छीनने की और भी तेज कोशिश हो रही है, शौर्य नीम के पत्तों जितना कड़वा सच कहती है। यह सच काला है और कुछ लोगों का आरोप है कि इस तरह की फ़िल्मों से भारतीय सेना का मनोबल टूट सकता है, लेकिन यह आरोप लोकतंत्र को न समझने वाले लोगों का है और उनके जितना ही खोखला है।
के. के. मेनन ने जीवन भर याद रखे जाने लायक अभिनय किया है। अंत में कोर्टड्रामा के एक लम्बे दृश्य में वे अपने दौर के, अपने आस पास के सब अभिनेताओं और सुपर स्टारों से मीलों आगे निकल गए हैं। उसी दृश्य का एक बहुत अच्छा संवाद है-
...सच ये है कि सात हज़ार फीट ऊपर मैं हड्डियाँ गलाता हूं, इसलिए तुम्हें सहूलियत मिलती है बुद्धिजीवी होने की...संवेदनशील होने की...डिस्को जाने की...त्योहार मनाने की...जीने की...
पत्रकार से फ़िल्म निर्देशक बने समर खान इससे पहले ‘कुछ मीठा हो जाए’ बना चुके हैं। इस बार इन्होंने हमारी फ़िल्मों और समाज में बनी हुई भारतीय सेना की परंपरागत छवि तोड़ी है। हम पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में किए जा रहे अत्याचारों का रोना रोते रहते हैं, लेकिन कभी इस पर बात नहीं करते कि हमारी अपनी सेना कश्मीर में क्या कर रही है? फ़िल्म किसी का पक्ष नहीं लेती, न ही फौज को गाली देती है। केवल फौज में घुस आए कुछ भेड़ियों के खिलाफ़ आवाज़ उठाती है, वो भी सभ्य तरीके से।
कहानी का मूल कथ्य अंग्रेज़ी की a few good men से प्रेरित है, लेकिन फिर भी बहुत मेहनत की गई है और फ़िल्म के पास अपना बहुत कुछ मौलिक है।
अदनाम सामी का संगीत ठीक है, सुकून देने वाला है। जावेद अख़्तर अपने आधे से ज्यादा गाने केवल लिखने के लिए लिखने लगे हैं। कमाया हुआ नाम डुबोने से बेहतर है कि थोड़ा विराम ले लिया जाए।
राहुल बोस ठीक लगे हैं, लेकिन क़े के की प्रतिभा के सामने बाकी सब दब गए हैं। राहुल और मिनिषा हिन्दी में उतने सहज नहीं लगते, जितना एक अभिनेता को होना चाहिए। दोनों ही हिन्दी के कई शब्द अंग्रेज़ी ढंग से बोलते हैं। मिनिषा लाम्बा ख़ूबसूरत हैं, लेकिन इसी तरह का किरदार ‘लक्ष्य’ में प्रीति जिंटा उनसे बहुत बेहतर ढंग से कर चुकी हैं।
जावेद ज़ाफरी ने शायद अपने जीवन का सबसे बेहतर अभिनय किया है। ऐसा लगता है कि उन्हें उनके लायक फ़िल्में कभी मिल ही नहीं पाई। सीमा बिस्वास छोटे से रोल में भी अपने हिस्से का काम बखूबी कर जाती हैं। अमृता राव एक चौंकाने वाले सुखद तोहफ़े की तरह हैं।
ओंकारा का रज्जू सबको याद होगा। दुबले पतले से असाधारण अभिनेता दीपक डोबरियाल केन्द्रीय किरदार में ज्यादा समय खामोश ही रहे हैं, लेकिन उनकी खामोशी बार बार अलग अलग तरीके से अपनी बात कहती रहती है। जब वे कहते हैं कि- “...एक और सच से आपको वाक़िफ़ करा दूं। मेरा नाम जावेद ख़ान है...और मैं अपने होने की सजा भुगत रहा हूं..”, तो हमारे पूरे समाज को बहुत मन्द स्वर से ही नंगा कर देते हैं।
सब आतंकवादी मुसलमान ही क्यों होते हैं....इन सबको गोली मार देनी चाहिए...सबको पाकिस्तान में भेज दो.... – इस तरह की बेसिरपैर की बातें करने वाले सरफिरे लोगों को ‘शौर्य’ जाते जाते जवाब दे जाती है- “...यही सॉल्यूशन है तो फिर तो उस कौम को भी खत्म कर देना चाहिए, जिसने महात्मा गाँधी को मारा, जिसने मार्टिन लूथर किंग को मारा...”
शौर्य भारत के मुसलमान की, भारत के फौजी की और भारत के लोकतंत्र की सच्ची कहानी है।
‘शौर्य क्या है’, जयदीप सरकार की यह उम्दा कविता फ़िल्म के आखिर में शाहरुख ख़ान की आवाज़ में आती है और फ़िल्म का सार बता जाती है।
मरती मारती इस दुनिया में निहत्थे डटे रहने की हिम्मत, शौर्य है...
‘शौर्य’ जरूर देखे जाने लायक है।
शुक्रवार, 25 अप्रैल, 2008
ये कैसी 'टशन'

साल की चिर प्रतिक्षित फिल्म के लिए अगर ये कहें कि 'खोदा पहाड़ और निकली चुहिया' तो गल्त न होगा। भोजपुरिया डॉन से बदला लेने निकली उसके पूर्व बॉस की बेटी की कहानी 70 के दशक की फिल्मों की याद करवाती है। बेमतलब का एक्शन और ढांय ढांय कहानी में जान नहीं डाल पाती। बचपन की मोहब्बत की कहानी (करीना-अक्षय कुमार) और डॉन की गैंग में घुस कर उसके 25 करोड़ रुपए उड़ाकर बदला लेना अब लोगों को नहीं पचता। पहले हाफ में तो लोग कहानी की तलाश में सिर पकड़ लेते हैं। कॉल सेंटर में काम करने वाला और इंगलिश टीचर सैफ अली खान अपनी शुरूआती फिल्मों की तरह आशिक मिज़ाज है, जो हर रोज़ नई गर्ल फ्रेंड की तलाश में रहता है। (काश डायरेक्टर साहब ने उनकी ऐसी पुरानी फिल्मों का हश्र ध्यान में रखा होता) एक दिन उनकी मुलाकात भोली भाली सीधी सादी करीना से होती है। करीना के चक्कर में फंस सैफ, डॉन 'भैया जी' यानि अनिल कपूर को अंग्रेजी सिखाने पहुंचता है। अदाओं को प्यार समझ धोखे के जाल में फंस कर सैफ करीना संग मिलके डॉन के 25 करोड़ उड़ा लेता है। लेकिन भई आज के ज़माने की हिरोईन और डॉन की पीए क्या सचमुच भोली भाली होगी? सो वो पैसे लेकर रफू चक्कर और अपने सैफ मियां बलि के बकरे बन जाते हैं। तभी एंट्री होती है जनाब बच्चन पांडे (अक्षय कुमार) की जो भैया जी के भक्त हैं और उनके नक्शे कदम पर चलते हुए डॉनगिरी में नाम कमाना चाहते हैं। न जाने हमारे फिल्मकारों को क्या हो गया है। यही जताने पर तुले हैं, आज कल के युवाओं के रोल मॉडल बस गुंडे ही हैं। कुछ हफ्ते पहले रिलीज हुई वन टू थ्री में तुषार का किरदार भी कुछ ऐसा ही था। खैर अब सैफ बच्चन की कस्टडी में है और करीना को ढूंढ कर लाने पर ही उसकी जान बख्शी जा सकती है। अक्षय कुमार पहले हाफ के मध्य में एंट्री के बाद फिल्म को पूरी तरह अपने कंधों पर उठा लेते, लेकिन बिना कहानी के हीरो फिल्म में जान नहीं डाल सकता। एक्शन के अलावा करीना को शादी के लिए प्रपोज करने की सलाह सैफ से लेने वाले सीन में अक्षय की एक्टिंग बेहद शानदार है। अनिल कपूर के भोजपुरी स्टाइल में हिंगलिश बोलना अखरता है। डायलाग समझने के लिए लोगों को काफी मशक्कत करनी पड़ेगी। दीवार के अमिताभ का इंगलिश स्टाइल कॉपी करने के चक्कर में वह अपने कैरेक्टर को बर्बाद कर गए, लेकिन एक्टिंग के मामले में उनका कोई सानी नहीं। करीना भी अपने रोल में सटीक बैठी हैं। 
खास कर उनका सीधी साधी लडक़ी से ग्लैमर डॉल बनते ही समंदर से निकलते हुए 5 सैकेंड का बिकिनी शो, लेकिन बॉक्स आफिस पर ये शो कितनी भीड़ जुटा पाता है कहना मुश्किल है। सैकेंड हाफ में गोलियों की बारिश में अकेले अक्षय का मजे से लडऩा और हाथ पर गोली लगने के बाद अगले ही सीन में वह करीना के बदन पर उसी हाथ को फिरा कर इश्क फरमाते नजर आते हैं और खरोंच एक भी नहीं। डायरेक्टर साहब ने 70 के दशक का प्लाट तो उठा लिया, लेकिन ये भूल गए शायद कि उन दिनों अगर हीरो के गोली गले, तो हीरोईन चाकू गर्म कर उसे निकाल कर पट्टी करती है, ही ही ही।। कानपुर का बच्चन सिंह जो मुश्किल से भोजपुरी अंदाज में हिंदी बोल पाता है, अचानक उर्दू लफ्जों वाले गीत फलक तक ले चल भी... गाने लगता है। वाह! डायरेक्टर साहब। फिल्म से बतौर डायरेक्टर विजय कृष्णा आचार्य बढ़ीया स्टार कास्ट के बावजूद कहानी के मामले में चूक गए। विशाल-शेखर का म्यूजिक भी निराश करता है। पंजाब के उदास गीतों का बादशाह सलीम का गाया टाइटल ट्रैक भी पूरे झमेले में कहीं खोकर रह गया।
यश राज से पीवीआर की मुनाफा बंटवारे को लेकर चल रही 'टशन' के चलते पीवीआर सहित कई मल्टीपलैक्स में फिल्म नहीं लग सकी। यश राज बैनर, कहानी को गुप्त रखने के चलते बढ़ी उत्सुकता और आज कल बाक्स आफिस पर छाई हुई स्टार कास्ट भीड़ को पुराने स्टाइल के सिनेमा घरों तक खींच लाने में सफल रहे। जिन मल्टीपलैक्स में टशन लगी है, उन्होंने सारे शोस का हाउस फुल का 'टशन' (बोर्ड) भी टांग दिया पर वीक एंड तक फिल्म की हवा निकल सकती है। गैर भोजपुरी क्षेत्रों में भी फिल्म को नुकसान होगा।
शुक्रवार, 18 अप्रैल, 2008
साहिल का नजरिया-संगीत
classically mild
सोनू निगम एक ऐसा नाम है कि भारतीय संगीत को जानने वाला शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति हो जो इससे अन्जाना हो.इनकी खासियत है कि ये जो भी करें ,चाहें फिल्मों में चलताऊ गाने गायें या कोई गंभीर गाना गायें,या फ़िर अपना अल्बम ही क्यों न निकालें ,हमेशा छाये ही रहते हैं.ऐसा लगता है कि आज की पीढी के वे सबसे अधिक प्रतिभावान गायक हैं,इस सोच को पुख्ता करती है,उनकी हालिया रिलीज अल्बम classically mild,जिसमें इन्होने अपनी शास्त्रीय गायन की क्षमता को जमकर उभारा है ।
इस अल्बम के गीतकार हैं अजय झीन्गरण,जिन्होंने बेहद अर्थपूर्ण और भावपूर्ण गीत रचे हैं.इस अल्बम में कुल आठ गीत हैं,संगीत दिया है दीपक पंडित ने।
इस अल्बम की विशेष बात आदमी के तरह तरह के मूड्स को प्रतिविम्बित करते राग भैरव,राग खम्माज,राग विहाग और राग पुरिया धनश्री आदि के साथ पाश्चात्य वाद्य यंत्रों की संगत.
वैसे तो अल्बम के लगभग सभी गीत कर्णप्रिय हैं पर "छलकी-छलकी चाँदनी में गाती है दीवानगी " और "ऐ दिल मत रो..." बेहतरीन हैं।
विशेष- अच्छे संगीत की जरा भी परख हो तो इसे जरुर सुनें।
आलोक सिंह "साहिल "
सोमवार, 14 अप्रैल, 2008
साहिल का नजरिया
यू मी और हम
पिछले हफ्ते बॉक्स ऑफिस पर घोर ठंडक छाई रही,यद्यपि कि ३ "फिल्में खुदा के लिए","शौर्य" और 'भ्रम" रिलीज हुई थी पर तीनो का हाल बेहद बुरा,थोड़ा संतोष हुआ खुदा के लिए देखकर,वैसे भी इसके पीछे एक पूंछ लगी थी कि ये ४० साल बाद भारत में प्रदर्शित होने वाली कोई पाकिस्तानी फ़िल्म थी,कुछ इसका भी फायदा इस फ़िल्म को मिला फ़िर भी टिकट खिड़की तरस के रह गई,ऐसे में इस हफ्ते बॉक्स ऑफिस पर ज्यादा दबाव था क्योंकि अगले हफ्ते से "आई पी एल" शुरू होने जा रहा है तो इसका असर भी टिकट खिड़की पर पड़ना लाजिमी है,इन सबके बीच रिलीज हुई दो बड़ी फिल्में 'यू मी और हम' तथा 'क्रेजी ४".एक अजय देवगन निर्देशित तो दूसरी राकेश रोशन निर्मित.
अब आगे हम किसी फ़िल्म के बारे में बात करें उसके पहले जरुरी है कुछ मामूली सवालों से गुजरना-
१.क्या आप शादीशुदा/किसी के प्यार में हैं?
२.क्या आपके रिश्ते में ठंडक आ गई है?
३.क्या आप अपने पत्नी/पति/प्रेमी/प्रेमिका के साथ बैठकर कुछ द्विअर्थी संवाद और शोरगुल झेल सकते हैं?
यदि तीनों सवालों के जवाब सकारात्मक हैं तो पेश है,निर्देशक के तौर पर अजय देवगन की पहले पेशकश "यू मी और हम"-
कहानी पेशे से सायकात्रिस्ट डाक्टर अजय की है जो अपने दो दोस्तों और उनकी पत्नियों के साथ छुट्टियाँ मनाने स्टार क्रूज पर जाता है,वहाँ उसकी मुलाकात वेट्रेस का कम कर रही पिया (काजोल) से होती है.अजय पिया को देखते ही उसपर फ़िदा हो जाता है,और उसको पटाने के लिए तरह तरह के उलजलूल प्रयास करता है अंत में दोनों की शादी हो जाती है,इस तरह पहला हाफ ख़त्म.
अजय,पिया की जिंदगी हँसी खुशी चल रही होती है कि अचानक पता चलता है कि पिया को अल्जाईमेर(एक ऐसी बीमारी जिसमे इन्सान धीरे सबकुछ भूल जाता है) है.डाक्टर अजय को सलाह देते हैं कि पिया को केयर सेंटर भेज दो पर अजय राजी नहीं होता बाद में स्थिति इतनी बिगड़ जाती है कि न चाहते हुए भी अजय,पिया को केयर सेंटर भेज देता है.इसी बीच इनका एक बच्चा भी होता है.
पिया से दूर रहने पर अजय को इस बात का अहसास होता है कि उसने पिया को केयर सेंटर भेजकर बहुत बड़ी गलती कर दी,तो क्या हुआ की पिया एक बड़ी बीमारी से ग्रस्त है,उसका हक़ है कि वह अपने पति और बच्चे के साथ रहे.उसको अहसास होता है कि प्यार का मतलब केवल खुशी में ही नहीं बल्कि दुःख में भी साथ निभाना होता है और अजय अंत में पिया को हास्पिटल से घर लेता आता है.
इस फ़िल्म में दो कपल और भी हैं हैं पर उनका काम केवल मेन लीड को उभरना ही रहा. है.
अदाकारी- जिस फ़िल्म के दोनों लीड करेक्टर नेशनल अवार्ड विनर हों उसमें अभिनय कि बात ही क्या करना,बाकि कलाकार करण खन्ना,दिव्या दत्ता,सुमित राघवन,आदित्य राजपूत और इशा शर्वानी भी अपना अपना काम कर गए.
संगीत- विशाल भारद्वाज का संगीत औसत से थोड़ा ठीक और सिचुअशन के अनुकूल है.
निर्देशन- यद्यपि कि यह अजय का पहला प्रयास था फ़िर भी कहीं भी कच्चापन नहीं दिखा,यदि करण खन्ना और इशा शर्वानी के कुछ गंदे दृश्यों,द्विअर्थी संवादों तथा बेमतलब के शोर गुल से फ़िल्म को बचा ला जाते तो फ़िल्म और बेहतरीन हो गई होती.खैर यह काम काफी हद तक एडिटिंग में आता है.निर्देशन के लिए अजय को १० में ७ अंक दिए जा सकते हैं.
विशेष- जहाँ तक बात है कि फ़िल्म क्यों देखें क्यों न देखें तो इसके लिए आप उपर दिए गए सवालो का सहारा ले सकते है.
आलोक सिंह "साहिल"
शनिवार, 29 मार्च, 2008
दिमाग का कर डाला वन टू थ्री
इन दिनों कॉमेडी फिल्मों की एक ही रेस्पी बन कर रह गई है। नाम और काम का कन्फयूजन, सेक्स और डबल मीनिंग वन लाइनर और छुपे या खो गए खजाने को ढूंढने की भागदौड़। कॉमेडी फिल्मों के डॉन भी खूंखार नहीं बेवकूफ होते हैं। वन टू थ्री भी इसी रेसिपी की डिश है, जो खाते (देखते) हुए तो स्वाद देती है, लेकिन खत्म होते ही इसका स्वाद भूल जाते हैं। कहानी की शुरूआत डॉन मनोज पाहवा का हीरा गुम होने से शुरू होती है, जो दूसरे पापा डॉन के गुर्गे चुराते हैं। लेकिन उनसे ये हीरा उपेन पटेल और तनीशा चुरा लेते हैं। दोनों पांडी में समीरा रेडृडी के विटेंज कार शोरूम में काम करते हैं और हीरे को उसके पैट्रोल टैंक में छुपा देते हैं। फिर एंट्री होती है पहले लक्षमी नारायण तुषार कपूर जो डॉनगिरी में कॅरियर बनाना चाहता है और भाई से मर्डर की सुपारी लेकर होटल पहुंचता है, तो दूसरा लक्ष्मी नारायण सुनील शेट्टी अपने बॉस के लिए विंटेज कार खरीदने उसी होटल पहुंचता है और तीसरा लक्ष्मी नारायण परेश रावल अपनी दुकान के लिए डिजायनर अंडर गारमेंट खरीदने वहां पहुंचता है। फिर तीनों के काम की चिट्ठियां बदल जाती हैं और शुरू होता है गड़बड़झाला। परेश रावल का बलाऊज देखकर ब्रा का साइज बताने और पीस देखकर उसके मैटीरियल और दुकान का पता बताने वाले डॉयलॉग पूरी फिल्म में छाए रहते हैं, जबकि सुनील शैट्टी की लैफ्ट राइट शुरू में तो गुदगुदाती है, लेकिन बाद में तंग करने लगती है। बतौर डायरेक्टर पारी की शुरुआत कर रहे ऑफिस-ऑफिस सीरियल के लेखक अश्विनी धीर बिखरी हुई कहानियों को तो समेटने में सफल रहे। लेकिन वन लाइनर डबल मीनिंग डॉयलाग हाल से बाहर निकलते ही लोग भूल जाते हैं। कॉमेडी के मामले में तुषार कपूर, समीरा रेड्डी और सुनील शेट्टी वन रहे हैं, तो परेश रावल, ईशा दयोल और मुकेश तिवारी भी टू रहे हैं। उपेन पटेल और तनीशा बेकार साबित हुए हैं, तो नीता चंद्रा ओवर हैं। धीर भी क्लाइमैक्स में गलती कर गए हैं। कार को सिर पर उठाने से पहले सब सुनील शेट्टी के हाथों में गन पकड़ा देते हैं। फिर कार से हीरा लपकने के लिए वह खाली हाथ नजर आता है। हीरा गिरते ही वह सबको गन लौटाते नजर आता है। खैर फिल्म में दिमाग लगाने की जरूरत नहीं है, सवा दो घंटे हंसने के लिए फिल्म एक बार देखी जा सकती है। लेकिन ध्यान रखना परिवार के साथ नहीं दोस्तों के साथ, वरना घर से वन टू थ्री होना पड़ सकता है।

