पिछले दिनों m tv पर एक नए अल्बम का चित्राकन देखा .... अल्बम है अग्नी और गीत गीत के बोल हैं "साधो रे ... ये मुर्दों का गाँव ..." जी हाँ सही पहचाना आपने, ये कबीर जी की ही कविता है...कविता तो महान है ही , धुन भी अच्छी है .... गायकी औसत है मगर जो दिल को भा गयी वो है गीत का चित्राकन .... पांच मिनट के इस फिल्म मे सारे जीवन का सार दिखा ... दिखाया है - एक बच्ची दुनिया के मेले में बाहरी बुलावो मे आकर अपने पिता से बिछड़ जाती है.... मगर जब दिखावो का खोखलापन सामने आता है तो उसे पिता कि याद आती है .... पिता भी उसे ही खोज रहा है.... बच्ची पिता को वापस पाकर ही सन्तुष्ट हो पाती है .... ठीक उसी तरह जिस तरह हम सांसारिक भुलाओं मे आकर अपनी आतंरिक सत्ता से बिछड़ जाते हैं और फिर मिलने को तड़पते रहते हैं.... अंत मे कबीर जी कहते हैं " कहत कबीर सुनो भाई साधो...भटक मरो मत कोई ..." सुन्दर वचन .... ये video निश्चित ही मेरे तीन पसंदीदा videos में से एक बन गया है ... बाकी दो जो हैं वो है ...."कृष्णा " हरिहरन का और " माये री " पलाश सन् का .... आजकल बहुत चल रहा है ... आप भी ज़रूर देखियेगा और बतायियेगा कि कैसा लगा
सोमवार, 14 मई, 2007
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3 टिप्पणियाँ:
ये मुर्दों का गाँव तकरीबन पन्द्रह साल पहले अनिल चौधरी ने अपने सीरियल कबीर मे भी लिया था और बहुत बहुत अच्छा था. इस सीरियल में एक और अच्छा भजन था, रुत सावन नियरानी, कोई पिया से मिलादे.
आपने जो बताया है, उसे भी देखते हैं
अभी तक तो देखा नही है पर अब जरुर देखेंगे।
वाह संजीव जी,
ऐसी प्रस्तुति है आपकी कि मुझे भी देखना पढ़ेगा…।
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