मार्च का तीसरा सप्ताह था , हुआ यूं कि मैं एक साइबर कैफे में बैठकर अपनी मेल पढ़ रहा था , अभी कुछ दिन पहले ही मैंने ekavita की सदस्यता ली थी , मगर किन्ही कारणों से मैं उनके हिंदी digest को पढ़ नही पा रहा था .... मदद के लिए यूँही अनूप जी के blog पर क्लिक मार दिया ... बस फिर क्या था ..... आओ की कोई खवाब बुने ... पर जैसे ही नज़र पडी एक जादू सा चल गया ... खुल गया एक झरोखा । झांक कर देखा तो पाया ... अनूप जी अकेले नही हैं .... हिंदी चिटठाकारों का एक अनूठा मेला ही सजा हुआ था वहां .... सभी एक से बदकर एक ... आप शायद यकीन नही करेंगे मगर इससे पहले मैं इस ब्लोग्गिंग जैसी चीजों को समय की बर्बादी समझता था ... हिंदी ब्लोग की तो कल्पना ही छोडीये... पर उस दिन लगा कि अपनी कविताओं को कहने के लिए शायद इससे अच्छा मंच मुझे नही मिलेगा .... यूं तो मैं एक गीतकार हूँ .... और इसी को अपना जीवन उपार्जन का साधन बनाना चाहता हूँ.... पर कभी कभी जब सवेदना गहरी हो जाती है तो कविता खुद ब खुद आती है मिलने मुझसे .... वो पल बडे हसीं होते हैं ... उनी पलों को समेटने की कोशिश है मेरा पहला ब्लोग - कुछ पल जिन्दगी जैसे .... गीत्कारी के तो सभी पहलुओं से लगभग वाकिफ हूँ मैं .... पर नही जानता तकनिकी तौर पर मेरी कवितायेँ कितनी ठीक हैं.... शायद अपने इसी अज्ञानता के चलते और कुछ स्वाभाव की झिझकता के कारण ही , मैं कभी मंच पर नही चढा , डरते डरते अपने ब्लोग पर जो भी पोस्टिंग करी सब को अब तक आप सब का ख़ूब सारा प्यार मिला है .... प्रोत्साहन मिला तो उत्साह बढ़ा ... फिर सोचा कि क्यों ना मैं जो कुछ भी पुरे हफ्ते पढता हूँ, सुनता हूँ देखता हूँ क्यों ना उन्हें आपके साथ भी बांटू ... इसी उदेश्य से देखा सुना की शुरुवात की है ... अब से हर हफ्ते मैं आपके सामने हाज़िर हूंगा लेकर -
सप्ताह की पुस्तक - जो भी पढा समझा
सफ्ताह देखा - कोई भी धारावाहिक dvd फिल्म या नाटक का ब्योरा
सुना - गत सफ्ताह जो भी सुना उसकी समीक्षा
जुम्मन मियां चौपाल पर - जुम्मन मियां के लतीफे और उनकी सीख
रविवार संपादकीय पत्र
आशा है की आप सब देखा सुना का हर अंक चाव से पढेंगे और अपनी राए से मुझे अवगत कराएँगे .... विशेष धन्यावाद दूंगा मैं अनूप जी को, राकेश जी को, समीर जी को , शुक्ला जी को, और जीतू जी को जिनका हर प्रोत्साहन मेरे लिए आशीर्वाद समान है.... साथ ही बेजी , परमजीत बाली, सुनीता शानू, यूनुस जी , रंजू , ममता पूनम सब के लिए बस इतना ही कहूँगा शुक्रिया .... करम ..... मेहरबानी ... अपनी बेबाक राय से मेरा हौसला यूँही बढ़ाते रहियेगा ..... आपका प्यार ही मेरा जीवन प्राण है .....सुन रहें हैं ना आप सब ... आप....आप ....और भी जनाब ......
रविवार, 20 मई, 2007
देखा सुना अंक १ - खुला एक झरोखा
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साप्ताहिक संपादकीय
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6 टिप्पणियाँ:
c/गीत्कारी/गीतकारी
आपका लिखा पढ़ने में बिन्दियाँ बहुत आड़े आईं :)
मेरा... मतलब ... है ... ये ... वाली...
पढ़ाते रहिए!
स्वागत है आपके इस साप्तिहिकी का.
आप लिखें, हम सब इंतजार में हैं.
शुभकामनाऐं.
आपकी कविताएँ तो सदा ही पढ़ती हूँ व अच्छी भी बहुत लगती हैं । अब जो नया लिखेगें उसे भी पढ़ेंगे । लिखते रहिये ।
घुघूती बासूती
आपका लिखा पढ़ने के इंतजार में हूं मैं!
घुघूती बासूती आलोक जी और संजीत जी बहुत बहुत स्वागत आपका .... समीर भाई और शुक्ल जी आशीर्वाद के लिए धन्यावाद ...... क्या करूं ये बिंदियाँ मेरी कमजोरी है भाई....
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