अपनी dvd संकलन में से एक फिल्म का जिक्र करना चाहूंगा " एक रुका हुआ फैसला " , यह एक ऎसी फिल्म है जो ९५ प्रतिशत एक बंद कमरे में शूट हुई है... गिने चुने किरदार हैं.... उन्ही के बीच संवाद चलता रहता है... मगर मजाल है जो आप एक मिनट के लिए भी ऊब महसूस कर जाएँ .... यह फिल्म अपने आप में एक नायाब प्रस्तुती है ..... पंकज कपूर एक यादगार भूमिका में हैं .... और उनका साथ दिया है nsd के उस समय के उभरते कलाकारों ने , और एक विशेष किरदार मे हैं अन्नू कपूर भी .... दोस्तो अगर नही देखी तो एक बार कम से कम इस फिल्म को ज़रूर देखें.... और अगर देखी है एक बार दुबारा देखिए ...... और इस बात पर विचार कीजियेगा की आज करोड़ों खर्च कर भी लोग इतनी मनोरंजक फिल्म नही बना पाते जो इन उत्साही लोगों की टोली ने कर दिखलाया करीब १५-२० साल पहले ।
रविवार, 20 मई, 2007
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6 टिप्पणियाँ:
बहुत अच्छी फिल्म है, शायद रंजीत कपूर ने डायरेक्ट की थी. पर अब ये फिल्म कहां से मिल गई आपको?
सुझाव के लिए धन्यवाद।
"और इस बात पर विचार कीजियेगा की आज करोड़ों खर्च कर भी लोग इतनी मनोरंजक फिल्म नही बना पाते जो इन उत्साही लोगों की टोली ने कर दिखलाया करीब १५-२० साल पहले"
Sanjeev Jee,
Meri baato se shayad aapko thoda nirasha hogee.
Ye film Hollywood ki ek bahut purani movie "12 Angry men" ki 200% copy hai, original movie B/W print me hai.
धुर्विरोधी जी आपने ठीक फरमाया है... रंजित कपूर ने ही निर्देशित की है ये फिल्म और सुकेश जी आप की जानकारी भी दुरुस्त है... मगर यूं तो हर दूसरी हिंदी फिल्म किसी अंग्रेजी फिल्म की नक़ल ही तो होती है ना ... बलि जी एक बार फिर धन्यावाद ... पड़ते रहिए
हाँ याद है, १९८५-८६ में आई थी, टीवी पर देखी थी। पर अब देखूँगा तो दूसरी नज़रों से देखूँगा।
पर यह बताइए कि इस फ़िल्म की डीवीडी आपने हथियाई कहाँ से?
एक और फ़िल्म को भी मैं तलाश रहा हूँ, वह है 'ये वो मञ्ज़िल तो न थी'।
बड़े भाई लोग माफ करेंगे तो एक भूल-सुधार की गुज़ारिश करुंगा.. बहुत पहले देखी थी इस फिल्म को.. तब इतनी समझ नहीं थी फिल्मों की.. आज ही डीवीडी के ज़रिए कंप्यूटर पर दोबारा देखी.. इस फिल्म के निर्देशक रंजीत कपूर नहीं हैं.. रंजीत कपूर ने फिल्म की कहानी और संवाद लिखे हैं..सिनऑय फिल्म्स के बैनर तले बनी इस फिल्म के निर्माता- निर्देशक हैं बासु चटर्जी... बासु चटर्जी ने पटकथा लिखने में रंजीत कपूर का सहयोग भी किया है.
फिल्म भले ही रीमेक हो.. ऑरिज़िनल फिल्म तो मैंने देखी नहीं है लेकिन फिल्म के संवादों के ज़रिए वर्गीय पूर्वाग्रह को जो शानदार चित्रण किया गया है वह हमारे सामाजिक यथार्थ के बहुत करीब है.. और बारह के बारह कलाकारों ने क्या ज़बरदस्त अभिनय किया है... आप वाह-वाह किए बिना नहीं रह सकेंगे.. एक कमरे में फिल्मायी गई 15 मीटर रील की इस फिल्म को 2 घंटे 7 मिनट और 49 सेकेंड तक साँस रोके आप देखते रहते हैं.. मज़ा आ गया.. अच्छी कृति...
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