राजनितिक स्वार्थ किसी धरती को दो हिस्सों में बाँट सकती है , भारत पकिस्तान बना सकती है, लेकिन तमाम कट्टरपंथी नारों के बीच भी सभ्यता और संस्कृति नही विभाजित हो सकी , इसी बात को साबित करती है ये पुस्तक " पाकिस्तानी शायरों की कवितायी " , हिंदी के शब्दों का सुन्दर इस्तेमाल कर इन शायरों ने जो दोहे , कवितायेँ और भजन लिखे वो यही दर्शाती है कि वहाँ भी हिंदी को वही मान मिलता है जो हम यहाँ उर्दू जुबां को देते हैं । प्रकाश पंडित का यह संकलन एक अच्छी कोशिश अवश्य है , प्रकाशन किया है आलेख प्रकाशन ने, मुल्य है १७५ रुपये ...
देखा सुना रेटिंग *** अच्छी
मुझे लग रहा है कि पुस्तक समीक्षा के साथ साथ क्यों ना कुछ सवेंदंशील विषयों पर चर्चा भी कर ली जाये लगे हाथों .... पिछले दिनों कला कि स्वतंत्र अभीव्यक्ती को लेकर बहुत बहस छिड़ी .... नैतिकता के स्वयम भू पहरुवों के आगे कला की स्वतंत्र अभीव्यक्ती यही विषय है .... कृपया अपनी राय अवश्य दें .... यदि आप इस विषय पर कुछ अपने ब्लोग में लिख चुके हैं ... तो उसका लिंक भी यहाँ दे सकते हैं .... स्वागत ....
रविवार, 27 मई, 2007
सप्ताह की पुस्तक - पाकिस्तानी शायरों की कवितायी
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