जब भी यादों की कोई खिडकी खुलती है , कोई गीत अतीत के परदे हटा कर झांकता नज़र आ जाता है। माजी का हर किस्सा, हर किरदार किसी ना किसी नग्मे की डोर थामे खङा मिलता है। गीत रचने के लिए ही तो जन्मा हूँ मैं, या फिर गीत रच रहे हैं मेरे जीवन को पल पल, लम्हों कि हर लड़ी , यादों की हर कडी, लगता है जैसे है जुडी , गीतों से नगमों से ग़ज़लों से , यही मेरे जीवन का सच है दोस्तो।
चार साल का था जब दिल्ली में आया था , घर में एक मात्र electronic समान था एक जेर्मन ब्रांड का रेडियो , गीत मुझे बहुत जल्दी याद हो जाते थे । "डफली वाले " उन दिनों का सबसे मशहूर गीत था , मैं अपनी माँ के लिए गाता था " तू कितनी अच्छी है " सुन कर वो बेहद खुश होती थी, स्कूल बस में बैठकर हम अन्ताक्षरी खेलते थे- " तितली उडी " , आजकल तेरे मेरे ", "याहू", "एक हसीना थी" जाने ऐसे कितने ही गाने । मधु गाती थी " ये समां ", असीम को " ये दोस्ती " और हरीश को " बिंदिया चमकेगी" पसंद हुआ करता था , छठी से आठवी तक का समय था जब मुझे छोटी उम्र में ही बड़ी सचाइयों का बोध हो गया था , उन दिनों लता दी मेरी धड़कन थी , और मुकेश रहते थे हर पल मेरे होटों पर - "आवारा हूँ", नैना बरसे", " ओ बेक़रार दिल" मेघा छाये" जैसे गीत जिन्होंने ह्रदय में दर्द के एहसास को जिन्दा किया । " तू ही नही मैं ही नही सारा ज़माना , दर्द का है एक फ़साना" जब मुकेश साब ने ये गाया होगा तब उन्होने कहॉ सोचा होगा कि उनका यह गीत किसी को दर्द सह कर भी जीने की प्रेरणा देगा । नवी दसवी में जब आया तो दोस्तो की संख्या बढ गयी । यहाँ किशोर के गीतों ने मुझे लोकप्रिय होने मे मदद की - " ओ मेरे दिल के चेन ", किसका रास्ता देखे", चिंगारी", " जीवन से भरी", रिमझिम गिरे सावन " कितने कितने सुरीले गीत, मधुसूदन गाता था " समा है सुहाना", रजा राम की पसंद थी " पल पल दिल के पास", मनोज सुनाता था " मुसाफिर हूँ यारों", मगर अतुल अलग था, उसे पसंद थी अलीशा, डिस्को फीवर पूरे जोर पर था । फिर एक नया दौर आया qsqt का , आमिर और जूही ने सब पर जादू चला दिया , मैं और अतुल क्लास में बैठकर गाते थे " पापा कहते हैं", अकेले हैं" और सारी क्लास झूम झूम जाती थी ।
( शेष अगली पोस्ट में )
सोमवार, 18 जून, 2007
गीतों में गुंथे लम्हे ( १ )
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6 टिप्पणियाँ:
आपकी यादों की खिड्की पूरी खुलने और आपकी अगली पोस्ट के इंतज़ार में...
*** राजीव रंजन प्रसाद
aapko wo sog 'tere ishQ mein.. bhejne ki koshish ki thi par g mail id se bounce back ho gaya !
वाह अच्छा समां बांधा है । मैं कुछ जोड़ने की हिमाक़त कर दूं ।
जब रेडियो से युववाणी करना शुरू किया तो कॉलेज में था ।
और दोस्तों की सेटिंग रहा करती थी । किसी की ‘किसी’ के लिए ‘ओ मेरे दिल के चैन’ बजाता और किसी की किसी के लिए उस दौर का गीत ‘जादू तेरी नज़र’ बजाता । यारों की प्रेमकहानियों के लिए ना जाने कितने गाने बजाए । गीत संगीत तो अपनी जिंदगी है भाई । हर गाने के पीछे एक इतिहास छिपा है । कोई याद छिपी है । क्या क्या कहें क्या क्या बताएं ।
भाई जब लिखते हो बेहतरीन और नया ही होता है हर पोस्ट में पाठक को कुछ नई दिशा ही देता है…अच्छा संमा तैयार किया…।बधाई!!!
बढ़िया सिलसिला तैयार किया है. मजा आया. जारी रखो, इंतजार है. बधाई.
यह बोलना तो भूल ही गये कि किसी दिन अपनी आवाज में कोई गीत रिकार्ड करके सुनवाओ, भाई!! जनता की मांग है.
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