बुधवार, 20 जून, 2007

गीतों में गुंथे लम्हे २

उन दिनों तेज़ाब और राम लखन के गीतों ने बड़ी धूम मचाई , दिवाली का समय था , और पूरे पहाड़ गंज के दुकानदारों ने speakers की कड़ियाँ जोड़ रखी थी , और पूरे मार्किट में बस एक ही गीत बज रहा था " एक दो तीन", मगर क्लास रूम में चला " सो गया ये जहाँ " , फिर आयी " मैंने प्यार किया " - जब मैं दसवी के बोर्ड की परिक्षा के बाद घर आता था , तो इस फिल्म के सभी गीतों को सुनता था और फिर से तारो ताज़ा हो जाता था , ऎसी ताकत होती है गीतों में ।


११ वी और १२ वी में जब आया तो आवारगी आ गयी जिन्दगी में और आशिकी भी। नदीम श्रवण के गीतों का जादू चला " सड़क" " साजन" ,दिल है कि मानता नही", दीवाना । जवान दिल में जवान उमंगों को जगाया - " मेरा दिल भी कितना पागल है", तेरी उम्मीद तेरा इंतज़ार", " बस एक सनम चाहिऐ" जैसे गीतों ने । जिंदगी में भी back to back दो लव अफेयर्स हुए , दूसरा जब खतम हुआ तो टूटा दिल था हाथ में , ग़ालिब कि जुबां में कहूं तो " इश्क से तबियत ने जीस्त का मज़ा पाया । दर्द कि दवा पायी, दर्द बेदवा पाया " उन दिनों कालेज का दूसरा साल था , पूरे ६ महीने मैं बस रोता रहा और साथ दिया अत्तौल्लाह खान की दर्द भारी ग़ज़लों ने , " अच्छा सिला दिया ", " मुझको दफना कर", अश्कों के लेके धारे" , कितने कितने , दर्द के बहाने ।


फिर ज़िंदगी में रचनात्मकता आयी , अचानक ही एक दिन मुझे पता चला की मैं भी लिख सकता हूँ, टीम बनी दीपक कमल, योगेश, रोहित , अनीता और हेमलता की । college festivals के चक्कर काटते काटते हेमंत दा और मन्ना दे को भी ख़ूब सुनना हुआ , ए आर रहमान ताज़ा ताज़ा जादू लेकर आये थे , रोजा और बोम्बे के गीत तो लोक्प्रिया थे ही मुझे तमिल में आयी उनकी फिल्म gentleman का संगीत बेहद पसंद आया ( क्या आपने सूना है इसे ) मेरे खुद के लिखे दो गीत " सूरज भी चल दिया" और "ये लम्हों का सफ़र" कालेज circle में काफी मशहूर हो चुका था, ढेरों ऑटोग्राफ देने का सुख भी प्राप्त कर चुका था , फिर कुछ समय मुझे ( करीब चार महिने ) सहारनपुर जाकर रहना पड़ा..... यहाँ आकर असल में मेरी कला परवान चढ़ी ... सुनीता से भी यहीं मुलाकात हुई थी ...विचित्र लड़की थी ( उसकी कहानी फिर कभी ) , अब पसंद भी बदल गयी थी । जगजीत सिंह थे नए कर्णधार " अपने होंठों पर", " आदमी आदमी को" " गरज बरस " उनकी रेशमी आवाज़ धद्कानो में बस चली थी , गुलज़ार साब के शब्दों की गहराई समझ में आने लगी "आने वाला पल", फिर वही रात है" "मेरा कुछ सामान" और उन्ही से मिल मिर्ज़ा ग़ालिब का पता .... वाह ज़िंदगी शायराना हो चली थी .....

( अन्तिम भाग कल की पोस्ट में ....)

2 टिप्पणियाँ:

yunus ने कहा…

अच्‍छा लग रहा है । आपकी कहानी में थोड़ी थोड़ी हम सबकी कहानी छिपी है । बिल्‍कुल यही दौर कमोबेश हमने भी जिया । थोड़े बहुत हेर फेर के साथ । पर संगीत के जिस दौर की बात आप कर रहे हैं, उसे वैसा का वैसा जिया है हमने ।

अनूप शुक्ला ने कहा…

अच्छा है। अंतिम भाग का इन्तजार है।