फिर आया जीवन में संघर्ष का दौर , अगले चार साल का हर पल मैंने भरपूर जिया , नूरुल्ह्सन , गोपाल, अरुण जी ज्योती , प्रिन्स , कितने कितने रिश्ते और कितने कितने गीत , मद्रास रोडवेस की उस बस एक लड़का गा रहा था " छईया छईया " जुहू बीच पर उस शाम सूरज को तकते हु मैंने सुना " कुछ कुछ होता है", कराम्जीत के जन्मदिन पर हम थिरके सुनकर " लोटन कबूतर" चंडीगढ़ के सफ़र में हमारे cameraman को पसंद था " ए शिवानी " , पहला नशा " , चप्पा चप्पा " " तुम्हे देखा तो ""तेरा मिलना " कितने कितने नग्मे और हर नग्मे से जुडी कितनी कितनी यादें ।
१९९९ के बाद जीवन में ठहराव आया , रचनात्मकता की यात्रा भी कुछ वर्षों के लिए थम गयी , कर्तव्य उन पर हावी हो गए । अगर कुछ नही बदला था तो वो था गीतों से जीवन का रिश्ता , " हम दिल दे चुके सनम " ताल "कहो ना प्यार है" ......
लगान के गीत बजे थे मेरी शादी में , अनु ( मेरी शरीक ए हयात ) को भाये " दिल चाहता है" के मस्ती भरे गीत ( आजकल वो बस "या अली" सुनती है.... अल्लाह ) । " देवदास " ने दीवाना कर रखा था जब मेरा बेटा दुनिया में आया , जब बिटिया आयी तो " कोई मिल गया " की धूम थी । पारिवारिक जिम्मेदारियों के साथ साथ अब मैंने संघर्ष को दिर शुरू कर दिया है , जब से ब्लोग्गिंग करनी शुरू करी है जीने का मज़ा आने लगा है और बदस्तूर जारी है गीतों का सफ़र , दुआ रही आप सब की तो यह सब और अच्छा होगा जल्द ही , किसी ने सच ही कहा है -
"संगीत का जो प्रेमी वो किस्मत वाला है "
गुरुवार, 21 जून, 2007
गीतों में गुंथे लम्हे ( अन्तिम कड़ी )
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3 टिप्पणियाँ:
बहुत अच्छा-ब्लॉगिंग से आपके जीवन में परिवर्तन आये-अच्छा रहा जानना. ईश्वर आपकी समस्त मनोकामना पूरी करे. शुभकामनायें.
पूरी श्रंखला ही सराहनीय है..बहुत बधाई आपको।
*** राजीव रंजन प्रसाद
वाह क्या बात है!
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