पिछले सप्ताह मैंने अपनी संगीत्मई आत्मकथा आप सब के साथ बाँटी..... जिसके बारे में यूनुस जी का कहना था ..." आपकी कहानी में थोड़ी थोड़ी हम सबकी कहानी छिपी है । बिल्कुल यही दौर कमोबेश हमने भी जिया । थोड़े बहुत हेर फेर के साथ । पर संगीत के जिस दौर की बात आप कर रहे हैं, उसे वैसा का वैसा जिया है हमने " और सुनिये उन्होने कुछ अपने खास पलों को भी याद किया कुछ इस तरह -
"जब रेडियो से युववाणी करना शुरू किया तो कॉलेज में था । और दोस्तों की सेटिंग रहा करती थी । किसी की ‘किसी’ के लिए ‘ओ मेरे दिल के चैन’ बजाता और किसी की किसी के लिए उस दौर का गीत ‘जादू तेरी नज़र’ बजाता । यारों की प्रेमकहानियों के लिए ना जाने कितने गाने बजाए । गीत संगीत तो अपनी जिंदगी है भाई । हर गाने के पीछे एक इतिहास छिपा है । कोई याद छिपी है । क्या क्या कहें क्या क्या बताएं"
वाह यूनुस जी मज़ा आ गया । अनूप जी , परमजीत जी , और सुनीता जी का बहुत बहुत धन्यवाद मेरी बोरिंग आत्मकथा को सराहने का।
मनीष , कृपया एक बार और कोशिश करना भाई, मेरा पता है sajeevsarathie@gmail.com . राजीव जी हम ने तो अपनी दास्तां सूना डाली , अब आपकी बारी है .... कुछ अपने बारे में भी बताइए । समीर भाई , आपकी फरमाइश अगर मान ली तो जो गिने चुने कद्रदान आप जैसे मुझ गरीब को पढ़ लेते हैं वो भी नही रहेंगे..हाँ अगर आप कभी दिल्ली आये और मुझसे मिले तो वादा है कि आवाज़ बेसुरी ही सही पर आपके लिए जरूर कोई गीत पेश करुंगा ।
शनिवार, 23 जून, 2007
यारां दा जवाब नई
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2 टिप्पणियाँ:
:) आभार. जरुर मुलाकात होगी.आपको सूचित किया जायेगा. :)
अरे भाई अपनी आत्मकथा को बोरिंग बता कर हमारी पसंद का मजाक मत उड़ाओ!
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