हमे सिखाया गया था कि भारत एक विकासशील देश है। आज की पीढ़ी को भी यही रटाया जा रहा है - हम तेज़ी से बढ रहे हैं, आज भारत में mobile users बढ गए हैं , सड़कों पर गाड़ियों की संख्या कई गुना बढ चुकी है, औधोगिक क्रांती ने सेंसेक्स चढ़ा रखा है, विदेशी कम्पनियों को हमारी मार्किट ललचा रही है , यातायात के साधन बढ़े हैं , सुविधाएं और तकनीक के मामले में हम प्रगती पर है , मगर कभी कभी लगता है ये सब कुछ देश कि कुल जन्सख्या के २० प्रतिशत से भी कम लोगों की पहुंच पर ही है , उठाकर देख लीजिये कोई भी अखबार या बस t.v. चालू कर कोई न्यूज़ चैनल को एक घंटे तक झेल लीजिये, मुमकिन है आप भी मेरी तरह depression में आ जायेंगे ।
सत्र के नुह इलाक़े में बिस्मिल्लाह नाम की औरत ने २३वे बच्चे को जन्म दिया , जनसँख्या नियंत्रण के अभाव वाले इस गाँव में हर परिवार में १०-१२ बच्चे आम बात है। तांत्रिकों, झोला डॉक्टरों, और मक्कार बाबाओं की काली कर्तुतें आजकल हर चैनल पर ख़ूब दिखायी जा रही है , कोई कुर्सियाँ मार कर इलाज करता है, कोई सिगरेट का भोग चढ़ाकर , कोई तो मासूम बच्चों की छाती पर चढ़ जाता है, और भीड़ खडी तमाशा देखती है, बाबा के गुणगान गाती है , नौकरी के नाम पर छोटे शहरों से लायी जाती है लडकियां , और चढ़ा दी जाती है यौन शोषण की बली , बाल मजदूरों को असहनीय हालातों में काम करने के लिए खुद को झोकना पड़ता है, १७ वर्षों से साथ रह रहे नौकर ने की मलिक के बेटे की नृशंस ह्त्या , कर्ज़ और बेरोजगारी से तंग आ कर एक उभरते हुए क्रिकेट खिलाडी ने की आत्महत्या , चलती गाडी में किया बिगडे रैस्जादों ने कालेज की युवती का मान भंग , चुड़ैल घोषित एक महिला को निर्वस्त्र गावं में चलाया गया - ये बस कुछ सुर्खियाँ थी जो पिछले दिनों अखबारों पे छायी थी ।
आज भी हमारा लोकतंत्र स्वार्थी नेताओं की जमात भर है, आज भी हमारी शिक्षा व्यवस्था लिपिक बनाने की कवायद मात्र है, आज भी हमारा किसान सूखे और बाढ़ की विप्दावों का शिकार है। रक्षक खुद भक्षक बन बैठे हैं , असुरक्षा की राजनीती ऎसी की कभी भी चिढ सकती है आरक्षण की मांग , कभी भी भड़क सकते हैं सम्प्रदिय्यिक दंगे , रिश्वतखोरी का ये आलम है की इमानदार आदमी को हिकारत से देखा जाने लगा है।
जब तक ऎसी कह्ब्रें हमारी सुर्खियाँ रहेंगी तब तक फीके ही कहलाएँगे - सुनीता की अन्तरिक्ष यात्रा की खुशी, सचिन की सेंचुरी का जश्न, ईश -अभिषेक की शादी के जलवे , सेंसेक्स की छलांग के किस्से .......
क्या हम सचमुच ये कह सकते हैं की हम विकास की डगर पर हैं ? सोचिये
मंगलवार, 26 जून, 2007
क्या कहती है ये काली सुर्खियाँ
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1 टिप्पणियाँ:
आप ठीक कह रहे है सजीव जी एसा लगता है कि हम विकास कि और कुछ जियादा ही बढ रहे है…
शानू
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