
अजी साब, आजकल की पीढी को तो फिल्मों ने खोखला
कर दिया" ये जुमला होता था अब से कुछ सालों पहले तक बड़े-बुजुर्गों को, जो भी समाज मे कुरीति हो बस दोष मढ़ दिया जता था फिल्मों पर. पर पिछले क़रीब दो-तीन सालों से हवा कुछ उलटी ही चल रही है, अब फ़िल्में समाज को राह दिखाती सी प्रतीत हो रही हैं, छोडिये बात बिगाड़ने की, आजकल की फ़िल्में युवा पीढी को सही दिशा दिखा कर उनका मार्गदर्शन कर रही है यूं तो फ़िल्में सदा ही समाज का आइना रही है, जो होता है आस पास होता है उसी से तो प्रेरणा लेता है फिल्मकार, पर बीते सालों में कुछ फ़िल्में ऐसी बनी है जिन्होंने इतने सकारात्मक बदलाव दिए हैं कि आज का फिल्मकार ख़ुद हैरान है अपनी सफलता पर.याद कीजिये फ़िल्म " रंग दे बसंती " का वह इंडिया गेट पर प्रदर्शन वाला दृश्य, करीब दो महीने बाद उ
स दृश्य से प्रेरित होकर सैकड़ों लोगों ने इंडिया गेट पर दिये जला कर जेसिका लाल मामले में न्याय की गुहार लगायी, उस मामले मे जो फैसला आया उसने भारतीयों को अपनी न्याय प्रणाली मे एक बार फ़िर आस्था जगा दी, यह हर आम आदमी की जीत जैसा था कुछ. फ़िल्म " लगे रहो मुन्ना भाई " आयी तो लोगों को एक बार गांधी जी समझ मे आने लगे, जो काम सालों से हमारी शिखा प्रणाली नही कर पायी इस इस फ़िल्म ने कर दिखाया, फ़िल्म " गुरू " ने युवाओं को प्रेरित किया कि यदि वह सपने देखते हैं तो उन्हें पूरा करने का भी हौसला रखें, अभी हाल ही में प्रदर्शित फ़िल्म " चक दे इंडिया " का उदहारण लीजिये, फ़िल्म में शाहरुख़ खान गर्त मे पडी महिला होकी टीम को फ़िर से खड़ा करते हैं और विश्व कप जीता लाते हैं, और बीते रविवार भारतीयों के सर गर्व से ऊँचे हो गए जब मुद्दतों बाद भारतीय होकी टीम ने एशिया कप मे जीत हासिल करी, किसे उम्मीद थी इस करिश्माई प्रदर्शन की, यक़ीनन इस सफलता का एक बड़ा श्रेय इस शानदार फ़िल्म को जाता है.फ़िल्में ताकतवर होती जा रही हैं, यह एक ऐसे माध्यम मे तब्दील होती जा रही है, जो यदि सार्थक बने, तो समाज की सोच और दिशा दोनों को बदलने की कुव्वत रखती है, एक फ़िल्म प्रेमी होने के नाते मैं इस चलन से बेहद खुश हूँ, और उम्मीद करता हूँ कि भविष्य में ऐसी ही सार्थक फ़िल्में और बने, और यह सिलसिला यूँही जारी रहे. 
बुधवार, 12 सितंबर, 2007
रंग दे ते चक दे
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3 टिप्पणियाँ:
सही कहा आपने! इन फिल्मों ने सचमुच युवाओं में एक नई चेतना का संचार किया है . अब देखिये भारतीय हॉकी टीम ने किस जोश से असिया कप पर कब्जा जमाया.
सारथि जी,
आपका लेख पढा। केवल आजकल की पीढी को खोखला नही किया, यह फ़िल्में तो आजादी के बाद की पूरी पीढी को खोखला कर चुकी हैं। समय मिलते ही इस पर लेख लिखूंगा, साथ ही यह भी कि भविष्य की पीढी को भी खोखला करने की तैयारी है, कुछ सार्थक फ़िल्में बन रहीं है पर अधिकतर में एसा नही है उम्मीद करते हैं कि कुछ निर्माता आगे भी इस तरह के फ़िल्में बनायेगे। आपका लेख वास्तविकता को उजागर करता है।
दीपक भारतदीप्
"यह एक ऐसे माध्यम मे तब्दील होती जा रही है, जो यदि सार्थक बने, तो समाज की सोच और दिशा दोनों को बदलने की कुव्वत रखती है,"
उम्मीद करें कि ऐसा ही हो -- शास्त्री जे सी फिलिप
आज का विचार: चाहे अंग्रेजी की पुस्तकें माँगकर या किसी पुस्तकालय से लो , किन्तु यथासंभव हिन्दी की पुस्तकें खरीद कर पढ़ो । यह बात उन लोगों पर विशेष रूप से लागू होनी चाहिये जो कमाते हैं व विद्यार्थी नहीं हैं । क्योंकि लेखक लेखन तभी करेगा जब उसकी पुस्तकें बिकेंगी । और जो भी पुस्तक विक्रेता हिन्दी पुस्तकें नहीं रखते उनसे भी पूछो कि हिन्दी की पुस्तकें हैं क्या । यह नुस्खा मैंने बहुत कारगार होते देखा है । अपने छोटे से कस्बे में जब हम बार बार एक ही चीज की माँग करते रहते हैं तो वह थक हारकर वह चीज रखने लगता है । (घुघूती बासूती)
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