मंगलवार, 23 अक्‍तूबर, 2007

He works in a call center

वो मेरे पड़ोस में रहता है, अक्सर जब ऑफिस के लिए निकलता हूँ, तो उनींदा सा मिलता है, यूं तो दिन भर सोता है पर शाम होते ही फिर तारो-ताज़ा होकर उठता है, रोज सूरज डूबते ही उसका दिन शुरू हो जाता है।
सिगरेट की दो डिब्बियां वह रोज फूंक देता है, बीयर भी रोज चाहिऐ "उस" किक स्टार्ट के लिए। 8.30 बजे उसे लेने कॉल सेंटर की कैब आ जाती है।
उसे खुशी है की सेंसेक्स आसमान छू रहा है।
वह अमेरिका में बैठे अपने ग्राहक से उसी की जुबान से घंटो बतियाता है, उसका लहजा कहीं भी अटकता नही, दुनिया भर के लोगों से बात कर उसका ज्ञान चौगुना बढ़ गया है।
दो महीने पहले वो क्या था ? एक कॉलेज स्नातक जिसे थोडा बहुत कंप्यूटर का ज्ञान था, पूरे दिन आवारागर्दी करता था, कौन पूछता था ?
और अब देखो क्या शान है, तनख्वाह भी मोटी है और ऐशो-आराम भी पूरा, हाँ तनाव भी है बहुत, टारगेट पूरे करने हैं, डेडलाइन करीब है, परिवार तो अब अजनबी सा हो गया है, वह भी अलग थलग रहना ही पसंद करता है, पर अकेलापन चुभता भी है कभी कभी, नीद अक्सर पूरी नही हो पाती, आँखों के नीचे काले गद्दे पड गए हैं, रक्तचाप भी कुछ बढ़ गया है, डिप्रेशन भी रहता है....
पर इन सब के बारे में कल सोचा जायेगा, वो बस आज में जीता है, और आज.... आज वह खुश है, जिंदगी से, बाजार भी ऊपर चढ़ रहा है, उसे गर्व है की देश की अर्थव्यवस्था को सुद्र्ड करने में उसका भी कहीं थोडा बहुत योगदान है।

2 टिप्पणियाँ:

रंजू ने कहा…

सच मैं सजीव जी यह कॉल कल्चर हमारे युवा को कहाँ से कहाँ ले जा रहा है ?
एक एक बात सच लिखी है आपने ..बच्चे अब अजनबी से हो गए हैं अपने ही घर में पर शायद यही अब सबने स्वीकार कर लिया है !

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत उम्दा लिखा है आज के आपा धापी भरे जीवन के विषय में. जब तक चेतेंगे, देर हो चुकी होगी. मगर बाजार की मांग है. क्या किया जा सकता है. आप बैठ जाईये, हजार दौड़ने को तैयार खड़े हैं.