राजनितिक स्वार्थ किसी धरती को दो हिस्सों में बाँट सकती है , भारत पकिस्तान बना सकती है, लेकिन तमाम कट्टरपंथी नारों के बीच भी सभ्यता और संस्कृति नही विभाजित हो सकी , इसी बात को साबित करती है ये पुस्तक " पाकिस्तानी शायरों की कवितायी " , हिंदी के शब्दों का सुन्दर इस्तेमाल कर इन शायरों ने जो दोहे , कवितायेँ और भजन लिखे वो यही दर्शाती है कि वहाँ भी हिंदी को वही मान मिलता है जो हम यहाँ उर्दू जुबां को देते हैं । प्रकाश पंडित का यह संकलन एक अच्छी कोशिश अवश्य है , प्रकाशन किया है आलेख प्रकाशन ने, मुल्य है १७५ रुपये ...
देखा सुना रेटिंग *** अच्छी
मुझे लग रहा है कि पुस्तक समीक्षा के साथ साथ क्यों ना कुछ सवेंदंशील विषयों पर चर्चा भी कर ली जाये लगे हाथों .... पिछले दिनों कला कि स्वतंत्र अभीव्यक्ती को लेकर बहुत बहस छिड़ी .... नैतिकता के स्वयम भू पहरुवों के आगे कला की स्वतंत्र अभीव्यक्ती यही विषय है .... कृपया अपनी राय अवश्य दें .... यदि आप इस विषय पर कुछ अपने ब्लोग में लिख चुके हैं ... तो उसका लिंक भी यहाँ दे सकते हैं .... स्वागत ....
रविवार, 27 मई, 2007
सप्ताह की पुस्तक - पाकिस्तानी शायरों की कवितायी
शूट आउट में संगीत
शूट आउट इन लोखंडवादा , अपूर्व लखिया की नयी फिल्म है , आजकल ट्रेंड है की मार धाड़ से भरपूर फिल्मों मे कुछ बडे जबर्दस्त गीतों को फिलर के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है, कांटे और दस इसके कामयाब उदाहरण है, शूट आउट .... में भी यही कोशिश की गयी है ..." मेरे यार " और " उनके नशे में " दो ऐसे गीत है जिन पर आदेश श्रीवास्तव के संगीत की चिर पर्चित मोहर है , सुखविंदर दिन ब दिन और बेहतर होते जा रहे हैं... मिक्का का गाया टपोरी अंदाज़ " गनपत " में बिल्कुल सटीक बैठता है, कुछ गालियों के बिना भी काम चल सकता था, " मुझे सोने दे माँ " पलाश सेन ने बेहद मार्मिक अंदाज़ में गाया है , शब्द भी सुन्दर है, ये ऐसा गीत है जिसे आप बार बार सुनना चाहेंगे , " prepare to die by the gun" एक अपराधी की कहानी का चित्रण है , मगर जो अल्बम का सबसे बहतरीन गीत है वो है पाकिस्तानी बैंड strings का " ये आखिरी अलविदा ना हो " , इसे आप बार बार गुनगुनाने से नही बच पाएंगे । ये मेरे मित्र आलोक का भी पसंदीदा गीत है , आलोक यह समीक्षा खास तुम्हारे लिए
देखा सुना रेटिंग *** अच्छा
अब आज का सवाल - मुझे बताइये आप के तीन सबसे प्यारे युगल ( duet ) गीत कौन से हैं , जनता हूँ बहुत मुश्किल काम है , पर कोशिश तो कीजिये ....मेरी पसंद ये है ॥
1. यूँही तुम मुझसे बात करती हो ....
२ बेखुदी में सनम ....
३ किसी मोड़ पर ....
अब आप की बारी ...
दिल्ली के सभी कवियों को निमंत्रण- एक शाम कविता के नाम
दोस्तो, बीते हफ्ते अपने एक मित्र के निमंत्रण पर मेरा साऊथ दिल्ली के ब्लू पिरामिड जाना हुआ , उस दिन मौसम भी कुछ नशीला सा था , दिल्ली पोएट्री के कुछ बेहद ही शानदार कवियों की महफ़िल जमी थी वहां , कविताओं और शायरी का दौर जब शुरू हुआ तो समां और भी खुशगवार हो गया , एक के बाद एक , श्रद्धा जी , पूनम जी , अमित, राधा सब का जादू सर चढ़ कर बोला , और अन्त में आयी सोने पे सुहागा शिबानी कश्यप जिन्होंने गिटार पर दो खूबसूरत गीत ऐसे गाये कि झूम उठी सारी महफ़िल .... सचमुच बहुत ही दिलकश थी वो शाम ..... दिल्ली और उसके आस पास रहने वाले सभी कवि मित्रों से मेरा अनुरोध है कि यदि वो भी इस महफ़िल का हिस्सा बनना चाहते हैं तो मुझे लिखें .... मैं आप का संदेश दिल्ली पोएट्री और ब्लू पिरामिड के कर्ता धर्ता अमित जी और विपुल जी तक ज़रूर पहुंचा दूंगा ये वादा है.... अगली गोष्टी ४ जून को है... इश्वर ने चाहा तो आप सब से वही मुलाक़ात होगी
रविवार, 20 मई, 2007
एक रुका हुआ फैसला
अपनी dvd संकलन में से एक फिल्म का जिक्र करना चाहूंगा " एक रुका हुआ फैसला " , यह एक ऎसी फिल्म है जो ९५ प्रतिशत एक बंद कमरे में शूट हुई है... गिने चुने किरदार हैं.... उन्ही के बीच संवाद चलता रहता है... मगर मजाल है जो आप एक मिनट के लिए भी ऊब महसूस कर जाएँ .... यह फिल्म अपने आप में एक नायाब प्रस्तुती है ..... पंकज कपूर एक यादगार भूमिका में हैं .... और उनका साथ दिया है nsd के उस समय के उभरते कलाकारों ने , और एक विशेष किरदार मे हैं अन्नू कपूर भी .... दोस्तो अगर नही देखी तो एक बार कम से कम इस फिल्म को ज़रूर देखें.... और अगर देखी है एक बार दुबारा देखिए ...... और इस बात पर विचार कीजियेगा की आज करोड़ों खर्च कर भी लोग इतनी मनोरंजक फिल्म नही बना पाते जो इन उत्साही लोगों की टोली ने कर दिखलाया करीब १५-२० साल पहले ।
संगीत चर्चा - कैसा है "यात्रा" का संगीत और कौन सा है साल २००७ का सबसे कामयाब गीत
यात्रा के संगीत के साथ वापसी हुई है ... खय्याम साब की ... कोशिश करी है उन्होने अपने इस संकलन में कि हर अंदाज़ में अपना जौहर वो दिखा सकें ... हर गीत में एक नयी अदायगी दी है..... आशा भोसले के गाये ठुमरी गीत " जामे मोहब्बत" उम्राओ जान के सदाबहार गीतों की यादें ताजी कर देता है ...." आप तो मेरे ही ..." पुराने अंदाज़ का है ..... वहीँ गुलाम अली लौटे हैं खूबसूरत ग़ज़ल " साज़ ए दिल नगमा ओ जान ...." के साथ और लौटा है वही पुराना जादू ..... शुद्ध हिंदी शब्दों की मिठास से भरा गीत है " मधुर मधुर दूर कोई..." आशा की आवाज़ में .... कुल मिला कर कहें तो ख्याम साब यह साबित करने में कमियाब रहें हैं... कि उनमे अब भी दम ख़म है ।
देखा सुना रेटिंग *** अच्छा
बीता वर्ष संगीत के लिहाज से बहुत ही उत्तम रहा है , यहाँ मैं दे रहा कुछ बहुत ही कमियाब गीतों की सूची अब आप बताइए की इन मे से कौन सा गीत है जो आपको सबसे ज्यादा पसंद है ..... या कोई और गीत है तो वह भी -
खलबली - रंग दे बसंती
झलक - अक्सर
चांद सिफारिश - फना
बीडी जलैली - ओम्कारा
मितवा - कभी अलविदा ना कहना
अजनबी शहर है - जानेमन
आप मुझे ईमेल भी कर सकते हैं sajeevsarathie@gmail.com
सप्ताफ की पुस्तक " तनहा "
लेखक आबिद सुरती का मूळ गुजराती उपन्यास है ये जिसका हिंदी रूपांतरण किया है s k publishers ने । आबिद सुरती से शायद आप परिचित होंगे.... इन्होने धरम्युग पत्रिका के दब्बू जी के पात्र का लगभग ३० वर्षों तक चित्रकन और लेखन किया है । यह उपन्यास एक मानसिक रुप से रुग्ण हत्यारे की कहानी है जिन्हे serial killer कहा जाता है.... विषय में नयापन है.... मगर कहानी कहने का अंदाज़ बिल्कुल फिल्मी है.... एक चित्रकार के भीतर टकराते अंधेरों -उजालों का केनवास दिखने की कोशिश मे आबिद मुझे चुके हुए से लगे यहाँ .... और अन्त तो बिल्कुल ही नीरस और उबाऊ है.....कुल मिला कर अगर आप सफर में समय कटने के लिए कुछ पढ़ना चाहते हैं , तो आप के लिए यह पुस्तक ठीक रहेगी ....अन्यथा ....... आप खुद समझदार हैं ।
देखा सुना रेटिंग ** औसत
देखा सुना अंक १ - खुला एक झरोखा
मार्च का तीसरा सप्ताह था , हुआ यूं कि मैं एक साइबर कैफे में बैठकर अपनी मेल पढ़ रहा था , अभी कुछ दिन पहले ही मैंने ekavita की सदस्यता ली थी , मगर किन्ही कारणों से मैं उनके हिंदी digest को पढ़ नही पा रहा था .... मदद के लिए यूँही अनूप जी के blog पर क्लिक मार दिया ... बस फिर क्या था ..... आओ की कोई खवाब बुने ... पर जैसे ही नज़र पडी एक जादू सा चल गया ... खुल गया एक झरोखा । झांक कर देखा तो पाया ... अनूप जी अकेले नही हैं .... हिंदी चिटठाकारों का एक अनूठा मेला ही सजा हुआ था वहां .... सभी एक से बदकर एक ... आप शायद यकीन नही करेंगे मगर इससे पहले मैं इस ब्लोग्गिंग जैसी चीजों को समय की बर्बादी समझता था ... हिंदी ब्लोग की तो कल्पना ही छोडीये... पर उस दिन लगा कि अपनी कविताओं को कहने के लिए शायद इससे अच्छा मंच मुझे नही मिलेगा .... यूं तो मैं एक गीतकार हूँ .... और इसी को अपना जीवन उपार्जन का साधन बनाना चाहता हूँ.... पर कभी कभी जब सवेदना गहरी हो जाती है तो कविता खुद ब खुद आती है मिलने मुझसे .... वो पल बडे हसीं होते हैं ... उनी पलों को समेटने की कोशिश है मेरा पहला ब्लोग - कुछ पल जिन्दगी जैसे .... गीत्कारी के तो सभी पहलुओं से लगभग वाकिफ हूँ मैं .... पर नही जानता तकनिकी तौर पर मेरी कवितायेँ कितनी ठीक हैं.... शायद अपने इसी अज्ञानता के चलते और कुछ स्वाभाव की झिझकता के कारण ही , मैं कभी मंच पर नही चढा , डरते डरते अपने ब्लोग पर जो भी पोस्टिंग करी सब को अब तक आप सब का ख़ूब सारा प्यार मिला है .... प्रोत्साहन मिला तो उत्साह बढ़ा ... फिर सोचा कि क्यों ना मैं जो कुछ भी पुरे हफ्ते पढता हूँ, सुनता हूँ देखता हूँ क्यों ना उन्हें आपके साथ भी बांटू ... इसी उदेश्य से देखा सुना की शुरुवात की है ... अब से हर हफ्ते मैं आपके सामने हाज़िर हूंगा लेकर -
सप्ताह की पुस्तक - जो भी पढा समझा
सफ्ताह देखा - कोई भी धारावाहिक dvd फिल्म या नाटक का ब्योरा
सुना - गत सफ्ताह जो भी सुना उसकी समीक्षा
जुम्मन मियां चौपाल पर - जुम्मन मियां के लतीफे और उनकी सीख
रविवार संपादकीय पत्र
आशा है की आप सब देखा सुना का हर अंक चाव से पढेंगे और अपनी राए से मुझे अवगत कराएँगे .... विशेष धन्यावाद दूंगा मैं अनूप जी को, राकेश जी को, समीर जी को , शुक्ला जी को, और जीतू जी को जिनका हर प्रोत्साहन मेरे लिए आशीर्वाद समान है.... साथ ही बेजी , परमजीत बाली, सुनीता शानू, यूनुस जी , रंजू , ममता पूनम सब के लिए बस इतना ही कहूँगा शुक्रिया .... करम ..... मेहरबानी ... अपनी बेबाक राय से मेरा हौसला यूँही बढ़ाते रहियेगा ..... आपका प्यार ही मेरा जीवन प्राण है .....सुन रहें हैं ना आप सब ... आप....आप ....और भी जनाब ......
सोमवार, 14 मई, 2007
अग्नी - साधो रे
पिछले दिनों m tv पर एक नए अल्बम का चित्राकन देखा .... अल्बम है अग्नी और गीत गीत के बोल हैं "साधो रे ... ये मुर्दों का गाँव ..." जी हाँ सही पहचाना आपने, ये कबीर जी की ही कविता है...कविता तो महान है ही , धुन भी अच्छी है .... गायकी औसत है मगर जो दिल को भा गयी वो है गीत का चित्राकन .... पांच मिनट के इस फिल्म मे सारे जीवन का सार दिखा ... दिखाया है - एक बच्ची दुनिया के मेले में बाहरी बुलावो मे आकर अपने पिता से बिछड़ जाती है.... मगर जब दिखावो का खोखलापन सामने आता है तो उसे पिता कि याद आती है .... पिता भी उसे ही खोज रहा है.... बच्ची पिता को वापस पाकर ही सन्तुष्ट हो पाती है .... ठीक उसी तरह जिस तरह हम सांसारिक भुलाओं मे आकर अपनी आतंरिक सत्ता से बिछड़ जाते हैं और फिर मिलने को तड़पते रहते हैं.... अंत मे कबीर जी कहते हैं " कहत कबीर सुनो भाई साधो...भटक मरो मत कोई ..." सुन्दर वचन .... ये video निश्चित ही मेरे तीन पसंदीदा videos में से एक बन गया है ... बाकी दो जो हैं वो है ...."कृष्णा " हरिहरन का और " माये री " पलाश सन् का .... आजकल बहुत चल रहा है ... आप भी ज़रूर देखियेगा और बतायियेगा कि कैसा लगा
बुधवार, 9 मई, 2007
कोई बात चले
कोई बात चले , गुलज़ार और जगजीत सिंह की नयी अल्बम है , इससे पहले ये संगम अल्बम " मरासिम" मे सुनने को मिला था । गुलज़ार कि गजलों , नज़मो और त्रिवेनियों को जगजीत ने बखूबी स्वर्बध किया है और गाया भी लाजवाब है , अल्बम एक त्रिवेनियों से शुरू होती है -
जिंदगी क्या है जानने के लिए
जिंदा रहना बहुत ज़रूरी है
आज तक कोई भी रहा तो नही ....
बस....फिर तो एक जादू सा चल पड़ता है...... आओ हम सब पहन ले आईने
सारे देखेंगे अपना ही चेहरा
सबको सारे हँसी लगेंगे यहाँ .....
ग़ज़ल आप जो इन दिनों यहाँ होते हलके मूड की है तो सहमा सहमा बहुत ही उदास कर जाती है ..... महसूस कीजिये जरा एक पल देख लूं तो उठता हूँ जल गया सब जरा सा रहता है ... और भी कुछ कमाल की गज़लें है। जो लोग जगजीत को सुनते आये हैं उन्हें याद होगा बहुत पहले दूरदर्शन पर आने वाले सीरियल हैलो जिंदगी का टाइटिल सोंग, वह भी इस अल्बम आप सुन पाएंगे । कुल मिल कर ग़ज़ल के चाहने वालों के लिए एक नायाब तोहफा है ये अल्बम ..... जरूर सुनियेगा .... जाते जाते...एक त्रिवेणी और...
उम्र के खेल मे एकतरफा है ये रस्साकशी
एक सिरा मुझको दिया होता तो कोई बात भी थी
मुझसे पर्दा भी है और सामने आता भी नही
