शुक्रवार, 29 जून, 2007

जुम्मन मियां चौपाल पर २

जुम्मन - ( भिखारी से ) - " क्या बात है भैया , दिखे नही बहुत दिनों से , दरवाज़े पर तुम्हारी खट खट नही हुई बडे दिनों से "



भिखारी - " अरे मियाँ , हमने अपनी वो गली अपने जमाई राजा को देहेज में दे दी , लड़की ब्याही है तो कुछ ना कुछ तो देना ही था ना , अपनी गली उसे दे दी .... वैसे भी अब मेरी उम्र हो चली है ...."



जुम्मन - " लो.... हम तो अब तक उसे अपनी गली समझते थे .....आज पता लगा कि गली तो तुम्हारी थी.... चलो मुबारक हो ....."

मंगलवार, 26 जून, 2007

क्या कहती है ये काली सुर्खियाँ

हमे सिखाया गया था कि भारत एक विकासशील देश है। आज की पीढ़ी को भी यही रटाया जा रहा है - हम तेज़ी से बढ रहे हैं, आज भारत में mobile users बढ गए हैं , सड़कों पर गाड़ियों की संख्या कई गुना बढ चुकी है, औधोगिक क्रांती ने सेंसेक्स चढ़ा रखा है, विदेशी कम्पनियों को हमारी मार्किट ललचा रही है , यातायात के साधन बढ़े हैं , सुविधाएं और तकनीक के मामले में हम प्रगती पर है , मगर कभी कभी लगता है ये सब कुछ देश कि कुल जन्सख्या के २० प्रतिशत से भी कम लोगों की पहुंच पर ही है , उठाकर देख लीजिये कोई भी अखबार या बस t.v. चालू कर कोई न्यूज़ चैनल को एक घंटे तक झेल लीजिये, मुमकिन है आप भी मेरी तरह depression में आ जायेंगे ।

सत्र के नुह इलाक़े में बिस्मिल्लाह नाम की औरत ने २३वे बच्चे को जन्म दिया , जनसँख्या नियंत्रण के अभाव वाले इस गाँव में हर परिवार में १०-१२ बच्चे आम बात है। तांत्रिकों, झोला डॉक्टरों, और मक्कार बाबाओं की काली कर्तुतें आजकल हर चैनल पर ख़ूब दिखायी जा रही है , कोई कुर्सियाँ मार कर इलाज करता है, कोई सिगरेट का भोग चढ़ाकर , कोई तो मासूम बच्चों की छाती पर चढ़ जाता है, और भीड़ खडी तमाशा देखती है, बाबा के गुणगान गाती है , नौकरी के नाम पर छोटे शहरों से लायी जाती है लडकियां , और चढ़ा दी जाती है यौन शोषण की बली , बाल मजदूरों को असहनीय हालातों में काम करने के लिए खुद को झोकना पड़ता है, १७ वर्षों से साथ रह रहे नौकर ने की मलिक के बेटे की नृशंस ह्त्या , कर्ज़ और बेरोजगारी से तंग आ कर एक उभरते हुए क्रिकेट खिलाडी ने की आत्महत्या , चलती गाडी में किया बिगडे रैस्जादों ने कालेज की युवती का मान भंग , चुड़ैल घोषित एक महिला को निर्वस्त्र गावं में चलाया गया - ये बस कुछ सुर्खियाँ थी जो पिछले दिनों अखबारों पे छायी थी ।

आज भी हमारा लोकतंत्र स्वार्थी नेताओं की जमात भर है, आज भी हमारी शिक्षा व्यवस्था लिपिक बनाने की कवायद मात्र है, आज भी हमारा किसान सूखे और बाढ़ की विप्दावों का शिकार है। रक्षक खुद भक्षक बन बैठे हैं , असुरक्षा की राजनीती ऎसी की कभी भी चिढ सकती है आरक्षण की मांग , कभी भी भड़क सकते हैं सम्प्रदिय्यिक दंगे , रिश्वतखोरी का ये आलम है की इमानदार आदमी को हिकारत से देखा जाने लगा है।

जब तक ऎसी कह्ब्रें हमारी सुर्खियाँ रहेंगी तब तक फीके ही कहलाएँगे - सुनीता की अन्तरिक्ष यात्रा की खुशी, सचिन की सेंचुरी का जश्न, ईश -अभिषेक की शादी के जलवे , सेंसेक्स की छलांग के किस्से .......

क्या हम सचमुच ये कह सकते हैं की हम विकास की डगर पर हैं ? सोचिये

सोमवार, 25 जून, 2007

वो पहला प्यार

पहले प्यार को भूल पाना मुमकिन नही । उम्र के उस मोड़ पर जब जिन्दगी बचपन का हाथ छोड़कर जवानी की दहलीज पर पाँव रखती है उन नाज़ुक हालातों मे दिल का बहक जाना लाजमी है ।

कैसे भूल सकता है कोई पहली बार उन नज़रों का मिलना , दिल में उमंगों का खिलना , उन कोरे कुंवारे ख़्वाबों की नर्म दस्तक , वो रात और दिन के बैचैन लम्हात , उफ़, किस क़दर मासूम होती है वो पहली पहली चाहत, ऎसी मासूमियत फिर लौटकर कभी नही आती ।

पहले प्यार की यादें हमेशा तारो ताज़ा रहती है , ऐसे जैसे बस कल की ही बात हो, अक्सर ये एकतरफा ही रह जाता है , दोतरफा हो भी जाये तो लंबे समय तक नही निभ पाता क्योंकी इस नाज़ुक धागे से बंधे रिश्ते के पीछे सोच विचार या समझ का हिसाब किताब बिल्कुल भी नही होता , यहाँ मन लेन देन का गणित नही बिठाता , बस यूँही बिन मोल किसी का हो जाता है या किसी को अपना मान लेता है ।

पहला प्यार एक प्रेरणा है जो किसी को कवि बना देती है किसी को चित्रकार , ह्रदय में जब झंकार उठती है तो कोई आशिक बन जाता है तो कोई दीवाना । पहला प्यार वो नशा है जिसका सूरूर सारी उम्र नही उतरता .... क्योंकि पहले प्यार को भूल मुश्किल ही नही नामुमकिन होता है ।

शनिवार, 23 जून, 2007

यारां दा जवाब नई

पिछले सप्ताह मैंने अपनी संगीत्मई आत्मकथा आप सब के साथ बाँटी..... जिसके बारे में यूनुस जी का कहना था ..." आपकी कहानी में थोड़ी थोड़ी हम सबकी कहानी छिपी है । बिल्‍कुल यही दौर कमोबेश हमने भी जिया । थोड़े बहुत हेर फेर के साथ । पर संगीत के जिस दौर की बात आप कर रहे हैं, उसे वैसा का वैसा जिया है हमने " और सुनिये उन्होने कुछ अपने खास पलों को भी याद किया कुछ इस तरह -
"जब रेडियो से युववाणी करना शुरू किया तो कॉलेज में था । और दोस्‍तों की सेटिंग रहा करती थी । किसी की ‘किसी’ के लिए ‘ओ मेरे दिल के चैन’ बजाता और किसी की किसी के लिए उस दौर का गीत ‘जादू तेरी नज़र’ बजाता । यारों की प्रेमकहानियों के लिए ना जाने कितने गाने बजाए । गीत संगीत तो अपनी जिंदगी है भाई । हर गाने के पीछे एक इतिहास छिपा है । कोई याद छिपी है । क्‍या क्‍या कहें क्‍या क्‍या बताएं"
वाह यूनुस जी मज़ा आ गया । अनूप जी , परमजीत जी , और सुनीता जी का बहुत बहुत धन्यवाद मेरी बोरिंग आत्मकथा को सराहने का।
मनीष , कृपया एक बार और कोशिश करना भाई, मेरा पता है
sajeevsarathie@gmail.com . राजीव जी हम ने तो अपनी दास्तां सूना डाली , अब आपकी बारी है .... कुछ अपने बारे में भी बताइए । समीर भाई , आपकी फरमाइश अगर मान ली तो जो गिने चुने कद्रदान आप जैसे मुझ गरीब को पढ़ लेते हैं वो भी नही रहेंगे..हाँ अगर आप कभी दिल्ली आये और मुझसे मिले तो वादा है कि आवाज़ बेसुरी ही सही पर आपके लिए जरूर कोई गीत पेश करुंगा ।

गुरुवार, 21 जून, 2007

गीतों में गुंथे लम्हे ( अन्तिम कड़ी )

फिर आया जीवन में संघर्ष का दौर , अगले चार साल का हर पल मैंने भरपूर जिया , नूरुल्ह्सन , गोपाल, अरुण जी ज्योती , प्रिन्स , कितने कितने रिश्ते और कितने कितने गीत , मद्रास रोडवेस की उस बस एक लड़का गा रहा था " छईया छईया " जुहू बीच पर उस शाम सूरज को तकते हु मैंने सुना " कुछ कुछ होता है", कराम्जीत के जन्मदिन पर हम थिरके सुनकर " लोटन कबूतर" चंडीगढ़ के सफ़र में हमारे cameraman को पसंद था " ए शिवानी " , पहला नशा " , चप्पा चप्पा " " तुम्हे देखा तो ""तेरा मिलना " कितने कितने नग्मे और हर नग्मे से जुडी कितनी कितनी यादें ।

१९९९ के बाद जीवन में ठहराव आया , रचनात्मकता की यात्रा भी कुछ वर्षों के लिए थम गयी , कर्तव्य उन पर हावी हो गए । अगर कुछ नही बदला था तो वो था गीतों से जीवन का रिश्ता , " हम दिल दे चुके सनम " ताल "कहो ना प्यार है" ......

लगान के गीत बजे थे मेरी शादी में , अनु ( मेरी शरीक ए हयात ) को भाये " दिल चाहता है" के मस्ती भरे गीत ( आजकल वो बस "या अली" सुनती है.... अल्लाह ) । " देवदास " ने दीवाना कर रखा था जब मेरा बेटा दुनिया में आया , जब बिटिया आयी तो " कोई मिल गया " की धूम थी । पारिवारिक जिम्मेदारियों के साथ साथ अब मैंने संघर्ष को दिर शुरू कर दिया है , जब से ब्लोग्गिंग करनी शुरू करी है जीने का मज़ा आने लगा है और बदस्तूर जारी है गीतों का सफ़र , दुआ रही आप सब की तो यह सब और अच्छा होगा जल्द ही , किसी ने सच ही कहा है -

"संगीत का जो प्रेमी वो किस्मत वाला है "

बुधवार, 20 जून, 2007

गीतों में गुंथे लम्हे २

उन दिनों तेज़ाब और राम लखन के गीतों ने बड़ी धूम मचाई , दिवाली का समय था , और पूरे पहाड़ गंज के दुकानदारों ने speakers की कड़ियाँ जोड़ रखी थी , और पूरे मार्किट में बस एक ही गीत बज रहा था " एक दो तीन", मगर क्लास रूम में चला " सो गया ये जहाँ " , फिर आयी " मैंने प्यार किया " - जब मैं दसवी के बोर्ड की परिक्षा के बाद घर आता था , तो इस फिल्म के सभी गीतों को सुनता था और फिर से तारो ताज़ा हो जाता था , ऎसी ताकत होती है गीतों में ।


११ वी और १२ वी में जब आया तो आवारगी आ गयी जिन्दगी में और आशिकी भी। नदीम श्रवण के गीतों का जादू चला " सड़क" " साजन" ,दिल है कि मानता नही", दीवाना । जवान दिल में जवान उमंगों को जगाया - " मेरा दिल भी कितना पागल है", तेरी उम्मीद तेरा इंतज़ार", " बस एक सनम चाहिऐ" जैसे गीतों ने । जिंदगी में भी back to back दो लव अफेयर्स हुए , दूसरा जब खतम हुआ तो टूटा दिल था हाथ में , ग़ालिब कि जुबां में कहूं तो " इश्क से तबियत ने जीस्त का मज़ा पाया । दर्द कि दवा पायी, दर्द बेदवा पाया " उन दिनों कालेज का दूसरा साल था , पूरे ६ महीने मैं बस रोता रहा और साथ दिया अत्तौल्लाह खान की दर्द भारी ग़ज़लों ने , " अच्छा सिला दिया ", " मुझको दफना कर", अश्कों के लेके धारे" , कितने कितने , दर्द के बहाने ।


फिर ज़िंदगी में रचनात्मकता आयी , अचानक ही एक दिन मुझे पता चला की मैं भी लिख सकता हूँ, टीम बनी दीपक कमल, योगेश, रोहित , अनीता और हेमलता की । college festivals के चक्कर काटते काटते हेमंत दा और मन्ना दे को भी ख़ूब सुनना हुआ , ए आर रहमान ताज़ा ताज़ा जादू लेकर आये थे , रोजा और बोम्बे के गीत तो लोक्प्रिया थे ही मुझे तमिल में आयी उनकी फिल्म gentleman का संगीत बेहद पसंद आया ( क्या आपने सूना है इसे ) मेरे खुद के लिखे दो गीत " सूरज भी चल दिया" और "ये लम्हों का सफ़र" कालेज circle में काफी मशहूर हो चुका था, ढेरों ऑटोग्राफ देने का सुख भी प्राप्त कर चुका था , फिर कुछ समय मुझे ( करीब चार महिने ) सहारनपुर जाकर रहना पड़ा..... यहाँ आकर असल में मेरी कला परवान चढ़ी ... सुनीता से भी यहीं मुलाकात हुई थी ...विचित्र लड़की थी ( उसकी कहानी फिर कभी ) , अब पसंद भी बदल गयी थी । जगजीत सिंह थे नए कर्णधार " अपने होंठों पर", " आदमी आदमी को" " गरज बरस " उनकी रेशमी आवाज़ धद्कानो में बस चली थी , गुलज़ार साब के शब्दों की गहराई समझ में आने लगी "आने वाला पल", फिर वही रात है" "मेरा कुछ सामान" और उन्ही से मिल मिर्ज़ा ग़ालिब का पता .... वाह ज़िंदगी शायराना हो चली थी .....

( अन्तिम भाग कल की पोस्ट में ....)

सोमवार, 18 जून, 2007

गीतों में गुंथे लम्हे ( १ )

जब भी यादों की कोई खिडकी खुलती है , कोई गीत अतीत के परदे हटा कर झांकता नज़र आ जाता है। माजी का हर किस्सा, हर किरदार किसी ना किसी नग्मे की डोर थामे खङा मिलता है। गीत रचने के लिए ही तो जन्मा हूँ मैं, या फिर गीत रच रहे हैं मेरे जीवन को पल पल, लम्हों कि हर लड़ी , यादों की हर कडी, लगता है जैसे है जुडी , गीतों से नगमों से ग़ज़लों से , यही मेरे जीवन का सच है दोस्तो।

चार साल का था जब दिल्ली में आया था , घर में एक मात्र electronic समान था एक जेर्मन ब्रांड का रेडियो , गीत मुझे बहुत जल्दी याद हो जाते थे । "डफली वाले " उन दिनों का सबसे मशहूर गीत था , मैं अपनी माँ के लिए गाता था " तू कितनी अच्छी है " सुन कर वो बेहद खुश होती थी, स्कूल बस में बैठकर हम अन्ताक्षरी खेलते थे- " तितली उडी " , आजकल तेरे मेरे ", "याहू", "एक हसीना थी" जाने ऐसे कितने ही गाने । मधु गाती थी " ये समां ", असीम को " ये दोस्ती " और हरीश को " बिंदिया चमकेगी" पसंद हुआ करता था , छठी से आठवी तक का समय था जब मुझे छोटी उम्र में ही बड़ी सचाइयों का बोध हो गया था , उन दिनों लता दी मेरी धड़कन थी , और मुकेश रहते थे हर पल मेरे होटों पर - "आवारा हूँ", नैना बरसे", " ओ बेक़रार दिल" मेघा छाये" जैसे गीत जिन्होंने ह्रदय में दर्द के एहसास को जिन्दा किया । " तू ही नही मैं ही नही सारा ज़माना , दर्द का है एक फ़साना" जब मुकेश साब ने ये गाया होगा तब उन्होने कहॉ सोचा होगा कि उनका यह गीत किसी को दर्द सह कर भी जीने की प्रेरणा देगा । नवी दसवी में जब आया तो दोस्तो की संख्या बढ गयी । यहाँ किशोर के गीतों ने मुझे लोकप्रिय होने मे मदद की - " ओ मेरे दिल के चेन ", किसका रास्ता देखे", चिंगारी", " जीवन से भरी", रिमझिम गिरे सावन " कितने कितने सुरीले गीत, मधुसूदन गाता था " समा है सुहाना", रजा राम की पसंद थी " पल पल दिल के पास", मनोज सुनाता था " मुसाफिर हूँ यारों", मगर अतुल अलग था, उसे पसंद थी अलीशा, डिस्को फीवर पूरे जोर पर था । फिर एक नया दौर आया qsqt का , आमिर और जूही ने सब पर जादू चला दिया , मैं और अतुल क्लास में बैठकर गाते थे " पापा कहते हैं", अकेले हैं" और सारी क्लास झूम झूम जाती थी ।



( शेष अगली पोस्ट में )

बुधवार, 13 जून, 2007

कभी कभी "वो" करना ...

कभी कभी वो करना कितना अच्छा लगता है, जो हमने काफी समय से नही किया...



उस दिन बहुत दिनों बाद गौर से देखा गोधुली का ऐसा समां , डूबते सूरज की लालिमा कुछ और ही रंग लिए हुए थी उस शाम जब साथ थे कुछ बचपन के दोस्त और साथी....जो आज अलग अलग कर्यशेत्रों में , अपनी अपनी दुनियाओं में मसरूफ हैं , पर जुडे हैं दिल से दिल तभी तो बस एक पुकार पर दिल की, चले आये सभी...


हँसी मज़ाक ... चुहल्बाज़ियाँ ... एक दूसरे की टांग खिचायी ... थोड़े गिले शिकवे भी ... रात भर चला बियर और ग़ज़लों का मस्ती भरा दौर...


रात के १ बजे cannaut place के चक्कर लगना और मिल कर गाना " मुसाफिर हूँ यारों " सचमुच ऎसी शाम बरसों बाद आयी थी , एक नयी उमंग जिन्दगी में भर गयी , और दे गयी कुछ ना भूलने वाली यादें ...


कभी कभी " वो" करना कितना अच्छा लगता है जो हमने काफी समय से नही किया ।

मंगलवार, 12 जून, 2007

जुम्मन मियां चौपाल पर १

जुम्मन का पड़ोसी -- " अपने सहब्जदे को ज़रा संभालो जुम्मन ... अभी से लुच्चा हुआ जा रहा है ... कल उसने मेरी बीबी को पत्थर मारा"



जुम्मन -- " लगा ? "



पड़ोसी ---- ( हैरानी से ) " नही "



जुम्मन ----- " फिर वो किसी और की औदलाद होगी जनाब ... मेरे सहब्ज़ादे का निशाना कभी नही चूकता ..."







संगीत चर्चा " झूम बराबर झूम "





शाद की इस नयी फिल्म का संगीत लाजवाब है । गुलज़ार साब फिर एक बार पूरे फॉर्म में हैं । शंकर ने तर्जें बनाने में कोई कसर नही छोडी । तमाम विवादों के बावजूद शीर्षक गीत तीनों अवर्तानो मे ज़बर्दस्त लगता है । " टिकट thollywood " की ताल शानदार है ... rock 'n'roll करता हुआ आता है गीत " किस ऑफ़ लव " और झुमने पर मजबूर कर देता है। " हलके हलके " सुन्दर शब्द रचना है ... ये ऐसा गीत है जो लंबे समय तक आपको भायेगा ... तो बस बेहिचक ले आइये ... नाचने की तैयारी कर लीजिये और गाते जयिये .... झूम बराबर झूम बराबर झूम बराबर झूम........



देखा सुना रेटिंग **** बहुत अच्छा

रविवार, 10 जून, 2007

तो क्या बुरे गब्बर ने मेरे अच्छे जय को मार दिया माँ ...

उन दिनों मैं महज चार साल का था , पिताजी की पोस्टिंग सिकंदराबाद से दिल्ली हो गयी थी , और उन्होने माँ और मुझे अपने पास बुला लिया था , घर में एक जर्मन ब्रांड का रेडियो था , जिसने मुझे लता , आशा, रफी, मुकेश, आदि से जोडा ( वो रिश्ता आज भी कायम है ) । उन दिनों जब मोहल्ले में कोई byscope वाला आता था तो सारे बच्चे उसके पीछे पीछे हो लेते थे , इक्का दुक्का घर थे जहाँ black & white टीवी हुआ करता था, शाम होते ही वहाँ मेला लग जाता था , फिल्मे देखना तो किसी विलासिता से कम नही हुआ करता था । एक दिन जिद्द और मिन्नतें कर कर के मैंने और माँ ने पिताजी को राजी कर ही लिया और हम भी चले उस दिन - विलासिता का स्वाद चखने । वो पहली फिल्म जो मैंने थियटर पर देखी वो थी गयी सदी की महान फिल्म - शोले । अब वो फिल्म कितनी दमदार थी इस बात का अंदाजा मेरे माता पिता को इस बात से ही हो गया था कि उनका चार साला शरारती लड़का पूरी साढ़े तीन घंटे की उस फिल्म को "चुप " बैठ कर देखता रहा ... यहाँ तक की जब फिल्म का विलन गब्बर सिंह उर्फ़ अमजद खान , हीरो ,जय यानी अमिताभ बच्चन को मार देता है , तो वीरू यानी धर्मेंद्र की साथ साथ मैं भी ख़ूब रोया था । जय की मौत का मुझे इतना अफ़सोस हुआ कि घर आकर भी मैं उदास रहने लगा , अक्सर माँ से पूछता " तो क्या बुरे गब्बर ने मेरे अच्छे जय को मार दिया माँ ..." माँ समझाती कि बेटा वो तो बस फिल्म है , जय सच मे थोड़ी ना मरा है, पर मुझे भला कैसे यकीन हो। आखिरकार हार कर पिताजी को मुझे अमिताभ की एक और फिल्म "दोस्ताना" दिक्लानी पडी , तब जाकर मुझे कुछ तसल्ली हुई थी ।


वक़्त का पहिया पूरा घूम गया है , आज पूरे २९ साल बीत चुके हैं ... अब इसे इत्तेफ्फक ही कहिये कि आज मेरा बे ता पूरे ४ साल का हो चका है ... और राम गोपाल वर्मा कोशिश कर रहें हैं " शोले " का जादू एक बार फिर चलाने की। अब वो कितने कामयाब होते हैं इस बात की कौसौटी मेरे लिये तो यही रहेगी कि ये फिल्म मेरे बेटे को बाँध कर रख सकती है या नही ... वैसे जहाँ तक शरारती होने का सवाल है वो मेरे से दस कदम आगे हैं ... यकीनन रामू जी के लिए चुनौती कड़ी होगी ....

शनिवार, 9 जून, 2007

कितने कितने आरक्षण

आरक्षण की आग एक बार फिर भड़की । इस बार जला राजस्थान , और लपटें पहुँची दिल्ली , हरियाणा और उत्तर भारत के कुछ और इलाकों तक। आख़िर कब तक फूंकते रहेंगे , इस देश के के युवावों को जिन्दा , और सेंकते रहेंगे अपने राजनितिक स्वार्थ की रोटियां , हमारे राजनेता । इस देश की गंदी राजनीती का ये खौफनाक चेहरा अब डराने लगा है , कितने वर्ग कितने धर्म , कितनी जातियाँ , कितने कितने आरक्षण , किस किस को देंगे आरक्षण ?

वो दिन कब आयेगा जब इस देश का युवा खुद पर यकीन करने लगेगा , उसे आरक्षण के नाम पर भीख नही मांगनी पडेगी , वह जति , धर्म , रंग के नाम पर बँटा नही होगा , और उनकी ताकत के आगे स्वार्थी राजनेताओं को घुटने टेकने पड़ेंगे । कब वो दिन आयेगा जब इस देश का युवा उठ कर कहेगा कि नही चाहिऐ हमे आरक्षण की बैसाखियां , हम सक्षम है खुद में , हम तैयार हैं अपनी और देश की तकदीर बदलने के लिए ... दोस्तो आगे बढ़ो और कमान संभालो , महज प्यादे ना रहो , वजीर बनो, राजा बनो, ताकतवर बनो ।

रविवार, 3 जून, 2007

भारत के तालिबानी - संस्कृति के स्वयम्भू पहरुए

महाराष्ट्रा के कल्याण इलाके में पुलिस को सारे cybercafe बंद करवाने पडे । क्यों ? कुछ खास तत्वों को orkut के website पर दी आयी किसी जानकारी से कुछ आपत्ति थी और उन लोगों ने अपना ग़ुस्सा कुछ cyber cafes में बडे पैमाने पर तोड़ फोड़ कर दिखाया । अखिर क्या जताना चाहते हैं ये संस्कृति के स्वयम्भू पहरुवे , कब तक लगते रहेंगे ये विचारों की अभिव्यक्ति पर इस तरह से रोक , कभी किसी सेंसर से प्रमाणित फिल्म का विरोध , तो कभी किसी कलाकार की रचनात्मक अभिव्यक्ति पर बवाल । अखिर कौन होते हैं ये , जो निर्धारित करें की क्या संस्कृती के दायरे में है और क्या नही - शिल्पा शेट्टी कि किस प्रकरण को लेकर शोर मचने वालों को इन दिनों हर चैनल पर प्रसारित हो रहे कच्छे बनियानों के विज्ञापनों में कोई खोट नज़र नही आती ? ftv पर पर प्रतिबंध लगा दिया पर अश्लील cds का क्या, जो बाजारों मे खुले आम धड़ल्ले से बिक रही है , जो बच्चों तक की पहुंच में आसानी से उपलब्ध पर इन्हें ये सब नही दिखता , पार्कों में बैठे जोडों पर ये डंडे चलाते हैं मगर बलात्कारियों और दहेज़ लोभी पतियों के खिलाफ ये खामोश रहते हैं, विदेशी कम्पनियों के खिलाफ नारे लगाते हैं , मगर खुद विदेशों में घुमाने का लुत्फ़ उठाते हैं, अखिर क्या पैमाना है इनका ? क्या हमारी सभ्यता , हमारी संस्कृती का मात्र इतना ही अस्तित्त्व है कि एक स्वतात्र रचनात्मक अभीव्यक्ति से उसकी नीवें हिल जाती है , विचारों की स्वतन्त्र अभीव्यक्ति हम सबका मूलभूत अधिकार है , इसके बिना कला का कोई अस्तित्व ही नही है। अब ये हम पर निर्भर है कि हम एक होकर इन तालिबानी ताकतों के खिलाफ अपनी आवाज़ बुलंद करें , या फिर चुप रह कर इनकी मंमानिओं को और बढावा दे ।

आप इस विषय में क्या सोचते हैं , लिखियेगा । यदि आप इस बारे में पहले कुछ लिख चुके हैं तो उसका लिंक दे ताकि जिन्होंने उसे नही पढा वो भी पढ़ सकें ।

देखा सुना के ३ अंक में आपका स्वागत है .