वो मेरे पड़ोस में रहता है, अक्सर जब ऑफिस के लिए निकलता हूँ, तो उनींदा सा मिलता है, यूं तो दिन भर सोता है पर शाम होते ही फिर तारो-ताज़ा होकर उठता है, रोज सूरज डूबते ही उसका दिन शुरू हो जाता है।
सिगरेट की दो डिब्बियां वह रोज फूंक देता है, बीयर भी रोज चाहिऐ "उस" किक स्टार्ट के लिए। 8.30 बजे उसे लेने कॉल सेंटर की कैब आ जाती है।
उसे खुशी है की सेंसेक्स आसमान छू रहा है।
वह अमेरिका में बैठे अपने ग्राहक से उसी की जुबान से घंटो बतियाता है, उसका लहजा कहीं भी अटकता नही, दुनिया भर के लोगों से बात कर उसका ज्ञान चौगुना बढ़ गया है।
दो महीने पहले वो क्या था ? एक कॉलेज स्नातक जिसे थोडा बहुत कंप्यूटर का ज्ञान था, पूरे दिन आवारागर्दी करता था, कौन पूछता था ?
और अब देखो क्या शान है, तनख्वाह भी मोटी है और ऐशो-आराम भी पूरा, हाँ तनाव भी है बहुत, टारगेट पूरे करने हैं, डेडलाइन करीब है, परिवार तो अब अजनबी सा हो गया है, वह भी अलग थलग रहना ही पसंद करता है, पर अकेलापन चुभता भी है कभी कभी, नीद अक्सर पूरी नही हो पाती, आँखों के नीचे काले गद्दे पड गए हैं, रक्तचाप भी कुछ बढ़ गया है, डिप्रेशन भी रहता है....
पर इन सब के बारे में कल सोचा जायेगा, वो बस आज में जीता है, और आज.... आज वह खुश है, जिंदगी से, बाजार भी ऊपर चढ़ रहा है, उसे गर्व है की देश की अर्थव्यवस्था को सुद्र्ड करने में उसका भी कहीं थोडा बहुत योगदान है।
मंगलवार, 23 अक्तूबर, 2007
He works in a call center
शनिवार, 20 अक्तूबर, 2007
कंजिकाओ के देश में
विजय दशमी को बस दो दिन रह गए थे, दीवाली के बाद उसकी शादी थी, ६ रोज बाद उसे गाड़ी पकड़नी थी, मगर उससे पहले वह कुछ करना चाहता था, वह अपनी काम शक्ति को परखना चाहता था, किसी कोठे पर जाकर किसी पेशेवर औरत से पेश आने की हिम्मत कहाँ थी उसमे ?, नपुंसक ही था शायद वो, कम से कम मानसिक तौर पर तो, उसे तो चाहिए था कोई आसान शिकार, अपनी मर्दानगी को साबित करने के लिए, और उसने चुना पड़ोस की छत पर सो रही चुनिया को, रात को मौका देखकर वह दबे पाँव छत पर पहुँचा, और नींद मे सो रही चुनिया को धर दोबोचा.
बच्ची की चीख सुन कर पिता छत की तरफ़ लपके, जीने मे किसी अजनबी से टकराए अचानक, चेहरा पहचान नही पाये, वह तेजी से अंधेरे में छुप गया, पर सन्नाटों में उन्होंने सुना, एक तरफ़ चुनिया की सिसकी थी और दूसरी तरह उसका भयानक अट्टहास जैसे गर्वित हो रहा हो अपने सफल प्रयोग पर. पर उस दाग का क्या जो ८ साल की चुनिए के मासूम दामन पर लग गया, उस डर का क्या जो उसके जेहन मे उम्र भर के लिए घर कर गया.
अगली सुबह कन्जिकाएं पूजी जानी थी, हर घर में नन्ही नन्ही कन्जिकाएं बैठी थी, जिनका बड़े आदर भाव से सत्कार किया जा रहा था, माथे तिलक लग रहा था, पूरी, हलवा और खीर परोसी जा रही थी, और वहाँ नन्ही सी चुनिया अस्पताल में मौत से जूझ रही थी, काश हमारे इस देश में विजय दशमी को रावण के पुतले न जला कर, ऐसे वहशी दरिंदों को फूंका जाता, जो मासूम बच्चे और बच्चियों को भी अपनी हवस से परे नही रखते .
मंगलवार, 2 अक्तूबर, 2007
भूल भुलैया
इन दिनो फ़िल्म "सांवरिया" के प्रोमो ने धूम मचा रखी है, प्रोमोस इतने दिलचस्प है कि फ़िल्म के प्रति उत्सुकता को बढ़ा जाती है, यूं भी संजय बंसाली की फिल्मों का किसे इंतज़ार नही रहता, मगर एक और टीसर है जिसने मेरा ध्यान अपनी और खीचा है इन दिनों, वो है फ़िल्म भूल-भुलैया का, प्रियदर्शन की यह फ़िल्म एक मलयालम सुपर हिट "मनीचित्रताजू" (रहस्य कि चाबी) की रीमेक है, (प्रियं की लगभग सभी फिल्मे रीमेक ही होती है, मुस्कराहट, गर्दिश, विरासत, भागम भाग, हेरा-फेरी, क्योंकि,ढोल इत्यादी इत्यादी )




