शनिवार, 29 मार्च, 2008

दिमाग का कर डाला वन टू थ्री

इन दिनों कॉमेडी फिल्मों की एक ही रेस्पी बन कर रह गई है। नाम और काम का कन्फयूजन, सेक्स और डबल मीनिंग वन लाइनर और छुपे या खो गए खजाने को ढूंढने की भागदौड़। कॉमेडी फिल्मों के डॉन भी खूंखार नहीं बेवकूफ होते हैं। वन टू थ्री भी इसी रेसिपी की डिश है, जो खाते (देखते) हुए तो स्वाद देती है, लेकिन खत्म होते ही इसका स्वाद भूल जाते हैं। कहानी की शुरूआत डॉन मनोज पाहवा का हीरा गुम होने से शुरू होती है, जो दूसरे पापा डॉन के गुर्गे चुराते हैं। लेकिन उनसे ये हीरा उपेन पटेल और तनीशा चुरा लेते हैं। दोनों पांडी में समीरा रेडृडी के विटेंज कार शोरूम में काम करते हैं और हीरे को उसके पैट्रोल टैंक में छुपा देते हैं। फिर एंट्री होती है पहले लक्षमी नारायण तुषार कपूर जो डॉनगिरी में कॅरियर बनाना चाहता है और भाई से मर्डर की सुपारी लेकर होटल पहुंचता है, तो दूसरा लक्ष्मी नारायण सुनील शेट्टी अपने बॉस के लिए विंटेज कार खरीदने उसी होटल पहुंचता है और तीसरा लक्ष्मी नारायण परेश रावल अपनी दुकान के लिए डिजायनर अंडर गारमेंट खरीदने वहां पहुंचता है। फिर तीनों के काम की चिट्ठियां बदल जाती हैं और शुरू होता है गड़बड़झाला। परेश रावल का बलाऊज देखकर ब्रा का साइज बताने और पीस देखकर उसके मैटीरियल और दुकान का पता बताने वाले डॉयलॉग पूरी फिल्म में छाए रहते हैं, जबकि सुनील शैट्टी की लैफ्ट राइट शुरू में तो गुदगुदाती है, लेकिन बाद में तंग करने लगती है। बतौर डायरेक्टर पारी की शुरुआत कर रहे ऑफिस-ऑफिस सीरियल के लेखक अश्विनी धीर बिखरी हुई कहानियों को तो समेटने में सफल रहे। लेकिन वन लाइनर डबल मीनिंग डॉयलाग हाल से बाहर निकलते ही लोग भूल जाते हैं। कॉमेडी के मामले में तुषार कपूर, समीरा रेड्डी और सुनील शेट्टी वन रहे हैं, तो परेश रावल, ईशा दयोल और मुकेश तिवारी भी टू रहे हैं। उपेन पटेल और तनीशा बेकार साबित हुए हैं, तो नीता चंद्रा ओवर हैं। धीर भी क्लाइमैक्स में गलती कर गए हैं। कार को सिर पर उठाने से पहले सब सुनील शेट्टी के हाथों में गन पकड़ा देते हैं। फिर कार से हीरा लपकने के लिए वह खाली हाथ नजर आता है। हीरा गिरते ही वह सबको गन लौटाते नजर आता है। खैर फिल्म में दिमाग लगाने की जरूरत नहीं है, सवा दो घंटे हंसने के लिए फिल्म एक बार देखी जा सकती है। लेकिन ध्यान रखना परिवार के साथ नहीं दोस्तों के साथ, वरना घर से वन टू थ्री होना पड़ सकता है।

शुक्रवार, 28 मार्च, 2008

प्यार,धोखे और पैसे की 'रेस'


रेस कोई भी हो, हर दौडऩे वाला बस जीतना चाहता है। कुछ ऐसी ही रेस है अब्बास-मस्तान की, जिसमें दौड़ रहे हैं सैफ, अक्षय, कैटरीना, बिपाशा, अनिल और समीरा। बाक्स आफिस पर ये रेस कितनी लम्बी चलती है फाइनल तो आने वाले दिनों में होगा, फिलहाल होली की छुट्टी के बावजूद फिल्म की ओपनिंग एवरेज रही।

मूवी में जिंदगी की रेस के तीन पहलू हैं, पैसा, धोखा और प्यार, जी हां कहानी में प्यार भी किया जाता है तो धोखा देने के लिए। रेस के असली हीरो सैफ अली खान हैं। चेहरे पर दाड़ी की लुक उन्हें खूब भाई है और उनके किरदार को सूट भी करती है, यही वजह है कि दर्शकों के दिलों पर वह छा जाते हैं। अब्बास मस्तान की जोड़ी खिलाड़ी और बाजीगर के बाद एक , अच्छी ससपेंस थ्रिलर बनाने में सफल हुई हैं। कहानी का केंद्र बिंदु सस्पैंस हैं, जो लोगों को पसंद आया है। म्यूजिक ठीक ठाक है, लेकिन बाकी गानों से ज्यादा लोग अल्हा दुआई है का इंतजार करते हैं और उन्हें इस गाने का डबल डोज मिलता है। एक बार गाना फिल्म में आता है, तो दूसरी बार क्लइमैक्स के बाद। कहानी दो सौतेले भाईयों की है जो डर्बन में स्टड फार्म चलाते हैं और रेस सैफ का पैशन है, लेकिन उसे हैरानी तब होती है जब उसका जान से प्यारा छोटा भाई उसकी जिंदगी की रेस पर फुल स्टॉप लगाना चाहता है। फिर शुरू होती है धोखे की रेस और इस धोखे का हथियार बनता है प्यार। सैफ अपने प्यार बिपाशा को अपने भाई को सौंप देता है, लेकिन ये त्याग नहीं धोखे के राज खोलने के लिए होता है। आखिर कलई खुलती है और धोखे के सूत्रधार कैटरीना और अक्षय, सैफ की जिंदगी की रेस पर फुल स्टाप लगाने की कोशिश करते हैं। खैर फिल्म एक बार देखने लायक तो है। कहीं कहीं फिल्म खिंचती सी लगती है, लेकिन एक नया सस्पेंस कहानी आगे बढ़ाता है। सो अगर सस्पेंस के साथ थ्रिल करने का शौक है, तो हो जाए रेस

नोट: दोस्तो वादे के मुताबिक हर हफ्ते रिलीज होने वाली कुछ खास फिल्मों की समीक्षा देने का प्रयास कर रहा हूं। रेस पिछले हफ्ते रिलीज हुई थी, लेकिन किसी कारण वश लिखने के बावजूद इसका रिव्यू पोस्ट नहीं कर सका। देरी के लिए क्षमा चाहता हूं। कल आपके लिए नई रिलीज हुई फिल्म वन टू थ्री की समीक्षा भी पेश होगी। तब तक मस्त रहें खुश रहें यूं ही सहयोग देते रहें।

गुरुवार, 27 मार्च, 2008

और गुरदास मान फफक कर रोने लगे (खास वीडियो)


गूरदास मान न सिर्फ पंजाबी गायकी की जीती जागती विरासत हैं, बल्कि पंजाबी गीतकारी के स्तर को कायम रखने में भी उनकी अहम भूमिका है। गुरदास के लिखे गीत कई सामाजिक बुराईयों के खिलाफ मुहिम बन कर खड़े हुए हैं और जो काम बड़े बड़े प्रचारक या नेता नहीं कर सके गुरदास के गीतों ने उन्हें भी कर दिखाया है।

बीते साल में उनका एक गीत कुड़िए इतना चर्चित हुआ के लोग इसे सुनकर आज भी भावुक हो जाते हैं। लोग तो छोड़िए खुद इस गीत के लिए गुरदास कितने भावुक हैं, मैंने 2007 की आखिरी शाम को अलविदा कहने के लिए रखे एक लाइव कंसर्ट में अपनी आखों से देखा। लोगों की फरमाइश पर गुरदास अपना सबसे ज्यादा चर्चित गीत 'छल्ला' गाने लगे। हाई स्केल के इस गीत का अभी अलाप ही शुरू किया था कि एक नन्हीं सी बच्ची हाथ में उनकी फोटो लेकर मंच के बिल्कुल सामने आकर खड़ी हो गई। गुरदास ने उसे मंच पर बुलाया और गले से लगा लिया। फिर एकदम से ऊंचे सुर को छोड़ कर निचले सुर पर आते हुए कुड़िए गीत को गाना शुरू किया। जैसे जैसे वो गीत की एक एक पंक्ति गाते गए, उनकी आखें में समंदर का तूफान उछाल पर आता गया। कब आंसूओं की सुनामी उनमें से बहने लगी पता न चला। गीत की आखिरी पंक्तियों पर आते आते वह एक दम नीचे नन्हीं बच्ची के कदमों में लेट गए। मेरे ख्याल से इससे बढ़िया ऑटोग्राफ आज तक किसी फैन को नहीं मिला होगा। फिर गुरदास ने उस बच्ची को उठकर गले लगा लिया। काफी पलों तक हजारों के पंडाल में सन्नाटा छाया रहा। उन्होंने बच्ची के हाथ में पकड़ी अपनी तस्वीर को उसके हाथ सहित अपने हाथ में लेकर ऑटोग्राफ दिया। उसके बाद वह प्रोग्राम को आगे नहीं बढ़ा सके और पैकअप कर दिया। अपनी गायकी के साथ अपनी भावुकता से वह लोगों को भ्रूण हत्या के खिलाफ गहरा संदेश दे गए। आप सब दोस्तों के लिए उस गीत का वीडियो खास तौर पर पेश कर रहा हूं। साथ ही गीत के बोल हिंदी लिपियांतर भी कर रहा हूं। अगर किसी शब्द के बारे में आप पूछना चाहते हैं, तो कमेंट्स में जरूर पूछें। मुझे वर्णन करने में खुशी होगी।



कुड़िए किस्मत थुड़िए तैनू ऐना प्यार देआं
अपने हिस्से दी दुनिया मैं तैथों वार देआं


तू जम्मी तां मापे कहन पराई एं धीए
सोहरे घर विच कहन बेगानी जाई एं धीए
केहड़े घर दी आखां तैंनू की सत्कार देआं
अपने हिस्से दी दुनिया मैं तैथों वार देआं

इक धोबी लई सीता मां नू राम विसार गए
जुए विच द्रौपदिए तैनू पांडो हार गए
जी करदा मैं अपनी किस्मत तैनूं हार देआं
अपने हिस्से दी दुनिया मैं तैथों वार देआं

सत्त भरा एक मिर्जा बाकी किस्साकारा ने
कल्ली साहिबा बुरी बनाती मर्द हजारां ने
कवियां दी इस गल्ती नू मैं किवें सुधार देआं
अपने हिस्से दी दुनिया मैं तैथों वार देआं

मरजाने दे अंदर वसदी कुड़िए जिउंदी रह
तू कमली मैं कमला तेरा गीत लिखाउंदी रह
सदा सुहागन थीवें तेरी नजर उतार देआं
अपने हिस्से दी दुनिया मैं तैथों वार देआं

रविवार, 23 मार्च, 2008

द ग्रेट खली को अंडर टेकर की मात खास वीडियो आपके लिए

17 फरवरी 2008 को मौत की रिंग में खली ने कुछ पल बिताए,आखिर अंडरटेकर से उसे हारना पड़ा। पूरी कहानी आपको पता है। बस उस फाइट की वीडियो आप सब दोस्तों के लिए


शुक्रवार, 14 मार्च, 2008

साहिल का नजरिया

पिछले हफ्तों बड़ी फिल्मो का अभाव रहा,बड़े दिनों बाद एक धमाके डर फ़िल्म आई,जोधा अकबर,तमाम अच्छी बातों के होने के बाद भी भारतीय लोकतंत्र हावी रहा और फ़िल्म को मिलाजुला response ही मिल सका,फ़िर जैसा की हर बड़े बैनर की फ़िल्म के रेलेअसे के बाद होता,बॉक्स ऑफिस पर फिल्मी सन्नाटा,सो फ़िर लंबा इन्तजार करना पड़ा,इन्तजार इसलिए भी करना था की अपने junior showman को अपने अस्तित्व की आखिरी लड़ाई लड़नी थी, खैर जैसे तैसे वो शुक्रवार भी आ ही गया,पहुँचा देखने, फ़िल्म का नाम black n white,निर्देशक -सुभाष घई कलाकार-अनिल कपूर,शेफाली शाह,अनुभव सिन्हा,हबीब तनवीर आदि..
एकबारगी तो लगा की घई पागल हो गए है,क्या विषय उठा लिए,पर bottom line यह है कि घई के तरकश में बाण अभी बाकी है.
कहानी एक ऐसे लड़के कि है जो गुजरात के दंगों में अपने परिवार को खो चुका होता है,उसके जेहन में बस यही रहता है कि हिंदुस्तान दुश्मन है और मुसलमानों के लिए यहाँ जगह नहीं है,उसका उद्देश्य १५ अगस्त को लाल किला में फिदायीन हमला करना है,जब वो बिस्फोत के १५ दिनों पहले चांदनी चौक पहुँचता है तो यहाँ उसकी मुलाकात होती है जाकिर हुसैन कालेज के प्रफेसर अनिल कपूर और उनकी पत्नी शेफाली शाह से,धीरे धीरे इनके साथ रहते रहते उसे अहसास होता है कि जो रास्ता उसने अख्तियार किया है वो कदापि ग़लत है,जो लोग जिहाद के नाम पर ऐसे हमले करते हैं वो असल में अपना उल्लू सीधा कर रहे होते हैं,
फ़िल्म में आतंकवाद के जड़ को दिखाते हुए यह बताने की कोशिस की गई है की आतंकवाद कोई भौतिक वस्तु या इन्सान नहीं है वरन एक विचार है जिसे वैचारिकता के माध्यम से ही ख़त्म किया जा सकता है.
अदाकारी-अनिल,शेफाली बेहतरीन राहे तो थियेटर सम्राट हबीब साहब usp,आज का छोरा अनुभव सिन्हा अपने किरदार के साथ इमानदारी बरतने में सफल रहा,
संगीत- बहुत स्तरीय नहीं रहा,पर back ground score औसत रहा cinematography- बेहतरीन,भव्य सेट्स के बरक्स चांदनी चौक की तंग गलियों को यथार्थ रूप में देखना सुखद रहा
निर्देशन- बहुत खुशी की बात है की केवल रूमानी सपने बेचने वाले भी अब यथार्थ को जानने लगे हैं, घई के कायल हो गए,१० में से ८ अंक
कुल मिलकर एक ऐसी फिल्म जिसको देखने के अनेक कारन नहीं देखने का सिर्फ एक,लटके झटकों का अभाव
अन्तिम बात- जरुर देखें

आलोक सिंह "साहिल"

गुरुवार, 13 मार्च, 2008

साहित्य अकादमी के चुनाव अब 13 अप्रैल को

पंजाबी साहित्य अकादमी के 30 मार्च को होने वाले चुनाव अब बैसाखी के दिन 13 अप्रैल को होंगे। दरअसल पंजाब यूनिवर्सिटी चंडीगढ़ 30 मार्च को विश्व पंजाबी कान्फ्रेंस करवा रहा है, जाहिर है दुनिया भर के पंजाबी विद्वान इसमें जुटेंगे। इस लिए सबने मिल कर सलाह दी कि चुनाव तो बाद में भी हो सकते हैं और सभी ने कान्फ्रेंस में शामिल होने के लिए इस फैसले को मंजूरी दे दी। देखा जाए तो इससे चुनाव लड़ने वालों को फायदा ही होगा। अगर उसी दिन चुनाव होते तो उम्मीदवारों को वोटर साहित्यकारों के लाले पड़ जाते। दूसरा अब उन्हें गोटियां फिट करने का ज्यादा समय भी मिल गया। खैर अब नामाकंण वापिस लेने कh आखिरी तारीख 23 मार्च है और चुनाव 13 अप्रैल।

हिंद युग्म के 'पहले सुर' का चर्चा भास्कर में

विश्व पुस्तक मेले में गूंजने के बाद पहला सुर जहां अब हर साहित्य प्रेमी के जेहनो दिल में गूंज रहा है, वहीं इसके चर्चे जुबां पर भी हैं। वीरवार के लुधियाना सिटी भास्कर के पहले पन्ने पर पहला सुर को सजाने वाली पूरी टीम के बारे में छपा है, जिसमें पहला सुर तैयार होने के सफर की दास्तान के बारे में बताया गया है, जिसे बयान किया है लुधियाना में हिंद युग्म के संगीत प्रहरी प्रभजोत सिंह पेरुब ने। सभी दोस्तों के लिए उसकी चिप्पी हाजिर है।

सोमवार, 10 मार्च, 2008

पंजाबी साहित्य अकादमी चुनावों के लिए रिकार्ड तोड़ नामांकन

आप हैरान होंगे लेकिन ये सच है कि इस बार लुधियाना स्थित पंजाबी साहित्य अकादमी जिसके दुनिया भर में फैले सभी प्रमुख पंजाबी लेखक(1200)सदस्य हैं के 2 साल बाद होने वाले विभिन्न पदों के चुनाव लिए के पहली बार 76 रिकार्ड तोड़ नामांकन मिले हैं। सिर्फ अध्यक्ष पद के लिए ही 7 लोगों ने दावेदारी जताई है, लेकिन माना जा रहा है कि अंत में तीन ही लोग लड़ाई लड़ेंगे। यही नहीं वरिष्ठ उपाध्यक्ष के लिए 10 उपाध्यक्ष के लिए 20, महासचिव के लिए 6 और केंद्रीय कार्यकारिणी के लिए 33 कलमकार वोट की लड़ाई लड़ने को मैदान में हैं। वैसे असली योद्धाओं की तसवीर तो 15 मार्च को ही साफ होगी लेकिन इतने नामाकण ही हैरानी जनक बात हैं। बहुत से ऐसे कलमकार भी है, जिन्होंने कई पदों के लिए पर्चे दाखिल कर डाले। माना जा रहा है कि करीब 35 नाम वापस लिए जाएंगे। चुनाव 30 मार्च को हैं और नामांकण वापिस लेने की आखिरी तारीख 15 मार्चप्रमुख सूची इस प्रकार है-
अध्यक्ष
डा एसपी सिंह, डा दिलीप कौर टिवाणा, गुरभजन गिल, डा तेजवंत गिल, प्रो निरंजन तसनीम, डा दीपक मनमोहन सिंह, डा सुखजीत
वरिष्ठ उपाध्यक्ष
डा गुरइकबाल सिंह, डा सुखदेच सिंह, प्रिंसीपल प्रेम सिंह बजाज, प्रो रविंदर भट्ठल, अवतार जोड़ा, डा दीपक मनमोहन सिंह, लाभ सिंह खीवा, सुखजीत, डा सुरजीत सिंह, सरिंदर कैले
महासचिव
सुभाष कलाकार, डा गुरइकबाल सिंह, डा सुखदेव सिंह, हरमीत विद्यार्थी, जसवंत सिंह जफर, डा सुरजीत सिंह

बुधवार, 5 मार्च, 2008

दिल्ली 6 में 'गोबर' हुए अतुल

सोचिए अगर आपका नाम गोबर हो तो कैसा लगे, बदबूदार तो नहीं महसूस कर रहें हैं खुद को। लगता है इतनी सी बात का बुरा मान गए, मैं तों यूं ही ठिठोली कर रहा था। दरअसल ये सवाल कल शाम को मेरे दिमाग में उस समय आया जब मैं अतुल कुलकर्णी का इंटरव्यू सुन रहा था। बुधवार की शाम लाइव इंडिया पर अतुल दर्शकों के रूबरू थे। जिन लोगों ने रंग दे बसंती और पेज थ्री देखी है, वो अतुल को बखूबी पहचानते होंगे। अरे भाई पेज थ्री के क्राइम रिपोर्टर और रंग दे बसंती में पहले धर्म सेना के सैनिक और फिर सरफरोशी की तमन्ना डायलॉग बोल बिसमिल्ल बन जाने वाले अतुल, उनका ये डायलॉग तो याद ही होगा। सो अतुल आज कल गोबर हो गए हैं। राकेश मेहरा की फिल्म दिल्ली 6 में उनके किरदार का नाम गोबर है। अतुल ने सिर्फ इतना कहा है कि अब तक निभाए गए सभी किरदारों में से ये किरदार बिल्कुल अलग है। कैरेक्टर रोल्स के बाद क्या वह कभी नाना पाटेकर की तरह लीड रोल तक पहुंच पाएंगे कि जवाब में अतुल कहते हैं, जल्द ही ये तमन्ना भी पूरी होने वाली है। फिलहाल उनकी आने वाली फिल्मों में कच्चा लिम्बू और अल्लाह के बंदे भी शामिल है। ठीक है अतुल लगे रहो बाकी लोगों पर छोड़ दो।

रविवार, 2 मार्च, 2008

टोपी उतार हिमेश चूस रहें है लॉलीपॉप (खास फोटो आपके लिए)


लिजिए कर्ज की रिमेक में हिमेश रेशिमया ने टोपी उतार ही दी। यही नहीं बच्चों की तरह लॉलीपाप भी चूस रहे हैं। खास फोटो यहां दे रहें हैं। बाकी फोटो देखने के लिए यहां जाएं।